डॉक्टर बनते-बनते शूटर बन गईं सिफ्त कौर:9 साल की थीं, जब राइफल थामी; गोल्ड जीता तो पिता को लगा अब जॉब मिल जाएगी

‘सिफ्त MBBS कर रही थी। शूटिंग की प्रैक्टिस की वजह से कॉलेज नहीं जा पाती। एक दिन उसने कहा- पापा, अब पढ़ाई नहीं करनी। मुझे शूटिंग में ही करियर बनाना है। उसने मेडिकल की पढ़ाई छोड़ दी। उसके कॉलेज के प्रिंसिपल ने रोका भी, लेकिन नहीं मानी।’ ‘उसने MBBS छोड़ा तो मैं सोचता था कि कहीं गलत फैसला तो नहीं ले लिया। उसकी जॉब की फिक्र थी। सिफ्त ने 2023 में नेशनल शूटिंग में ब्रिटिश शूटर का रिकॉर्ड तोड़ दिया। इसी साल उसने एशियन गेम्स में गोल्ड जीता। फिर लगा कि अब जॉब की फिक्र तो नहीं होगी।” प्रिंसिपल की बात मानी होती, तो पेरिस ओलिंपिक में मेडल पर निशाना लगाने जा रही सिफ्त कौर शायद आज डॉक्टर होतीं। पिता पवनदीप सिंह भी यही चाहते थे। एक इत्तेफाक से शूटिंग में आई सिफ्त ने पिता के मन के सारे शक दूर कर दिए। अब सिफ्त एक अगस्त को ओलिंपिक में 50 मीटर राइफल 3 पोजिशन इवेंट में निशाना लगाएंगी। आइए जानते हैं पंजाब के फरीदकोट में जन्मी सिफ्त कौर की शूटिंग जर्नी के दिलचस्प मोड़। पढ़िए सिफ्त के घर से ग्राउंड रिपोर्ट… टीचर ने शूटिंग में नाम भेजा, फिर सिफ्त रुकी नहीं
14 साल की सिफ्त 9वीं की पढ़ाई कर रही थीं। उनके स्कूल को शूटिंग के लिए एक लड़की का नाम भेजना था। पवनदीप बताते हैं, ‘स्कूल में दीपाली देशपांडे मैम थीं। उन्होंने सिफ्त का नाम शूटिंग के लिए भेज दिया। पूरे जिले से कोई और लड़की नहीं गई थी। इससे सिफ्त सीधे स्टेट लेवल तक पहुंच गईं। यहां सिफ्त ने चौथी पोजिशन हासिल की।’ पिता कहते हैं, ‘स्कूल की तरफ से शूटिंग करने के बाद सिफ्त इस ओर मुड़ गईं, लेकिन राइफल से उनका वास्ता पहले से ही था।’ कोई ट्यूशन नहीं पढ़ाता था, क्योंकि हर दूसरे दिन खेलने चली जाती थी
पवनदीप ने कहा, ‘मैं चाहता था कि खेल के साथ-साथ बेटी पढ़ाई पर ध्यान दे। बेटी को डॉक्टर बनाना चाहता था। सिफ्त रात-रातभर पढ़ती थी। NEET की तैयारी की। 11वीं-12वीं में उसे कोई ट्यूशन पढ़ाने को राजी नहीं था, क्योंकि सिफ्त हर दूसरे-तीसरे दिन दूसरे शहरों में खेलने चली जाती थी।’ ‘मेरे फ्रैंड सर्किल में दोस्त थे, जिन्होंने उसकी मेडिकल की पढ़ाई का जिम्मा लिया। सिफ्त दिनभर खेलती थी और रात 10-10 बजे तक मेरे दोस्तों से पढ़ती थी। वो जितनी अच्छी स्पोर्ट्स में है, उतनी ही होशियार पढ़ाई में भी है।’ मेडिकल की सीट हासिल की, वहां भी दिक्कत आ गई
पवनदीप ने बताया, ‘NEET क्रैक करने के बाद सिफ्त को फरीदकोट मेडिकल कॉलेज में सीट मिली। पर एक शख्स ने रिट पिटीशन लगा दी। कहा कि सिफ्त को बिना मेडिकल में MBBS में सीट नहीं दी जा सकती। तब सिफ्त जूनियर वर्ल्ड कप खेलने जर्मनी गई थी। इसके बाद यूनिवर्सिटी ने कहा कि सिफ्त का मेडिकल लौटने पर होगा। फिर ये पिटीशन खारिज हो गई।’ पवनदीप सिंह कहते हैं, ‘सिफ्त टूर्नामेंट्स के लिए बार-बार बाहर जाती थी। MBBS के लिए लेक्चर जरूरी हैं, लेकिन सिफ्त के लेक्चर शॉर्ट हो गए। उन्हें फाइनल एग्जाम में नहीं बैठने दिया गया।’ कभी-कभी सिफ्त कहती है MBBS ज्यादा आसान थी
पवनदीप सिंह कहते हैं, ‘सिफ्त को डॉक्टर बनाना मेरा सपना था और शूटर बनना सिफ्त का। वो शूटिंग में ही करियर बनाना चाहती थी। अब वो कभी-कभी कहती है कि MBBS करना ज्यादा आसान होता। जितना स्ट्रेस खेल में आगे बढ़ने में होता है, डॉक्टरी उससे कहीं आसान थी। अब जब सिफ्त खेलती है तो हमारे दिमाग में भी कैल्कुलेशंस चला करते हैं।’ ‘सिफ्त के प्रिंसिपल भी नहीं चाहते थे कि वो पढ़ाई छोड़े। वे चाहते थे कि सिफ्त कॉन्टिन्यू करें। MBBS की पढ़ाई खेल के साथ नहीं चल सकती थी इसलिए उसे छोड़ दिया। अब सिफ्त फिजिकल एजुकेशन में ग्रैजुएशन कर रही हैं।’ पिता बताते हैं, ‘सिफ्त की खूबी उसका व्यवहार है। वो किसी से एक बार भी मिले, भीड़ में भी उसे पहचान लेगी। अगर कहीं देखा तो खुद जाकर मिलेगी। जमीन से जुड़े रहने की खासियत उसे दूसरों से अलग बनाती है।’ सिफ्त को पंजाबी गाने पसंद, बिंदास लड़की है
सिफ्त की कोच दीपाली देशमुख बताती हैं, ‘सिफ्त को पंजाबी गाने सुनना पसंद है। कई बार इसके लिए लड़ भी जाती है। रेंज में जो भी हो, वो वहीं तक रहता है।’ दीपाली देशमुख बताती हैं, ‘सिफ्त किसी के कहने से प्रभावित नहीं होती। उसे जो करना है, वही करती है। जो काम हाथ में लिया है, उसे पूरा करना सिफ्त की आदत है। उसका जीवन मंत्र है- बी योर सेल्फ।’ सिफ्त लक्जमबर्ग से ट्रेनिंग करके पेरिस पहुंची हैं। देश में उन्हें 46 नेशनल कैंप किए हैं और 96 बार उन्हें फॉरेन एक्सपोजर दिलाया गया। हालांकि, ये ट्रेनिंग प्रोग्राम पूरी शूटिंग टीम के लिए था और इस पर 60.40 करोड़ खर्च हुए। सिफ्त की पर्सनल ट्रेनिंग दिल्ली में हुई और इसका बजट 1.63 करोड़ रुपए था।