सवाल- मैं अहमदाबाद से हूं और मेरा बेटा 10 साल का है। वह शुरू से ही पढ़ाई में अच्छा रहा है। हमें उस पर बहुत गर्व है, लेकिन अब उसकी एक आदत चिंता का कारण बनने लगी है। दरअसल उसे हर बार क्लास में फर्स्ट आना होता है और अगर एक नंबर भी कम आ जाए तो वह टूट जाता है। इस बार जब वह क्लास में सेकेंड आया तो उसने खाना-पीना छोड़ दिया। खुद को कमरे में बंद कर लिया, दिनभर रोया और खुद को बुरा-भला कह रहा था कि ‘मैंने सब खराब कर दिया’, ‘मैं लूजर हूं’। हमने उसे समझाया कि यह जिंदगी का अंत नहीं है। लेकिन वह हमारे किसी तर्क को नहीं समझा और काफी समय तक परेशान रहा। उसकी यह सोच हमें अंदर से डरा रही है। कहीं जाने-अनजाने में हम ही तो उसे हर बार जीतने का दबाव नहीं दे रहे हैं? हमें डर है कि अगर यही मानसिकता बनी रही तो आगे चलकर यह उसकी मेंटल हेल्थ पर बुरा असर डाल सकती है। मैं उसे इस बारे में कैसे समझाऊं? कृपया मार्गदर्शन करें। एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर जवाब- मैं आपकी चिंता समझ सकती हूं। आज के समय में कई माता-पिता इसी तरह की चुनौती का सामना कर रहे हैं। आपका बेटा पढ़ाई में अच्छा है, यह उसकी मेहनत और लगन को दर्शाता है। लेकिन जब हर बार फर्स्ट आना बच्चे के लिए एक जरूरत या जिद बन जाए और उसके पीछे यह डर छिपा हो कि ‘अगर मैं टॉप नहीं कर पाया तो मेरी वैल्यू कम हो जाएगी’ तो यह स्थिति चिंताजनक हो सकती है। यह परफेक्शनिज्म की ओर इशारा करता है, जहां बच्चा खुद से असंभव उम्मीदें रखने लगता है और छोटी-सी असफलता भी उसे भावनात्मक रूप से तोड़ देती है। ऐसे में सवाल सिर्फ बच्चे की सोच का नहीं है, बल्कि उसके आसपास के वातावरण का भी है। कहीं न कहीं, जाने-अनजाने में पेरेंट्स भी इस मानसिकता को बढ़ावा देते हैं। इसलिए बच्चे को इस स्थिति से निकालने से पहले पेरेंट्स का आत्ममंथन करना जरूरी है। इसके लिए पहले आप खुद से ईमानदारी से ये 10 सवाल पूछें… इन सवालों काे पूछने मकसद है कि पेरेंट्स खुद यह समझें कि वे अपने बच्चे पर जाने-अनजाने में किस तरह की उम्मीदों या दबाव का वातावरण बना सकते हैं। कभी-कभी हमारा ‘बेस्ट चाहने का इरादा’ भी बच्चे के मन में यह मैसेज दे सकता है कि वह तभी एक्सेप्टेबल है, जब वह सबसे आगे होगा। कुल मिलाकर अगर इन सवालों में से कई के जवाब ‘हां’ हैं तो इसका मतलब है कि आपको अपने नजरिए में थोड़ा बदलाव लाने की जरूरत है। बच्चे को परफेक्शनिज्म की सोच से लाएं बाहर 10 साल की उम्र वह समय है, जब बच्चा अपनी पहचान बनाना शुरू करता है। वह खुद को कैसे देखता है, इसका आधार यहीं से तैयार होने लगता है। ऐसे में अगर उसकी पहचान केवल रिजल्ट्स से जुड़ने लगे तो छोटी-सी असफलता भी उसके लिए व्यक्तिगत हार जैसी लग सकती है। वह सोचने लगता है कि ‘अगर मैं फर्स्ट नहीं आया तो मैं बेकार हूं। मेरी वैल्यू खत्म हो गई’। यही सोच धीरे-धीरे बच्चे में खुद के प्रति नफरत पैदा कर सकती है। यहां ये समझना जरूरी है कि आपका बेटा सिर्फ 10 साल का है। अभी उसका ब्रेन विकसित हो रहा है। अभी उसमें भावनाओं को प्रोसेस करने और असफलताओं को स्वीकार करने की क्षमता पूरी तरह से डेवलप नहीं हुई है। इसलिए यहां पेरेंट्स की भूमिका बेहद अहम हो जाती है। ऐसे में आपको न सिर्फ उसकी सफलता पर ध्यान देना है, बल्कि उसकी सोच, डर और सेल्फ-वैल्यू की भावना को भी गहराई से समझना होगा। ऐसे में बच्चे को इस परफेक्शनिज्म की सोच से बाहर निकालने के लिए कुछ तरीके अपना सकते हैं। तारीफ का तरीका बदलें, सोच पर असर पड़ेगा बच्चे की तारीफ करते समय केवल नंबर या रिजल्ट पर फोकस करने के बजाय उसकी मेहनत, ईमानदारी, लगातार की गई कोशिश और सीखने की जिज्ञासा को सराहें। इससे बच्चे को यह संदेश मिलेगा कि उसकी कोशिश और सीखने की प्रक्रिया सबसे अहम है, न कि केवल रिज्ल्ट। इस तरह की तारीफ बच्चे के आत्मविश्वास को मजबूती देती है और उसमें परफेक्शन की बजाय ग्रोथ माइंडसेट विकसित होता है। ‘परफेक्ट’ बनने की जिद को तोड़िए बच्चे को यह समझाना जरूरी है कि इंसान का विकास गलतियों और अनुभवों से होता है, न कि केवल जीत से। हर हार या कमी सफलता की राह में एक जरूरी सबक होती है। आप उसे ऐसे महान व्यक्तियों की कहानियां सुनाएं, जिन्होंने पढ़ाई में औसत होने के बावजूद दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई। जैसे अल्बर्ट आइंस्टीन और बिल गेट्स। अपनी बातचीत का रिव्यू करें कभी-कभी हम अनजाने में ऐसी बातें कह जाते हैं, जो बच्चों के मन में गहरा असर छोड़ जाती हैं। जैसे, ‘इस बार फर्स्ट आना चाहिए,‘ या ‘वो बच्चा तुमसे आगे कैसे निकल गया‘? ये छोटे-छोटे वाक्य बच्चे के भीतर तुलना, दबाव और आत्म-संदेह को जन्म दे सकते हैं। इसलिए अपनी बातचीत की भाषा को सहयोगात्मक बनाएं। तुलना की बजाय बच्चे की कोशिश, भावना और जिज्ञासा को महत्व दें। असफलता को स्वीकारना सिखाएं बच्चे को यह समझने में समय लगेगा कि एक-दो नंबर कम आने से उसकी अहमियत कम नहीं हो जाती है। लेकिन अगर आप धैर्य से उसे यह संदेश बार-बार देंगे तो वह धीरे-धीरे असफलता को एक सीख की तरह देखने लगेगा। इसके लिए आप अपनी किसी पुरानी गलती या असफलता का अनुभव साझा कर सकते हैं। उसे बताएं कि आपने कैसे उससे कुछ सीखा और आगे बढ़े। इससे बच्चे को यह महसूस होगा कि गलती करना सामान्य है, और वह अकेला नहीं है। उसे खुलकर बोलने का मौका दें बच्चा जब किसी डर, गुस्से या तनाव से जूझ रहा हो तो जरूरी है कि वह अपने दिल की बात आपसे कह सके। कभी-कभी वह सिर्फ सुने जाने की तलाश में होता है, न कि सलाह की। ऐसे समय पर उसे बिना टोके सुनें, बीच में न बोलें। उसकी बातों को गंभीरता से लें, चाहे वे आपको छोटी ही क्यों न लगें। कई बार पेरेंट्स जाने-अनजाने में कुछ गलतियां करते हैं, जिसका असर बच्चे पर पड़ता है। इन बातों का भी रखें ध्यान इसके अलावा कुछ और बातों का भी ध्यान रखें। जैसेकि- जरूरत हो तो काउंसलर की मदद लें अगर लगे कि स्थिति ठीक नहीं हाे रही है तो किसी चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट की मदद लेने से न हिचकें। कभी-कभी एक प्रोफेशनल की गाइडेंस से चीजें जल्दी संभलती हैं। अंत में यही कहूंगी कि आपके बेटे को प्यार और सपोर्ट की सबसे ज्यादा जरूरत है, रिजल्ट की नहीं। उसे बताइए कि आप उसे हर हाल में स्वीकार करते हैं, चाहे वह फर्स्ट आए या नहीं। यही भरोसा उसे मानसिक रूप से मजबूत बनाएगा। ………………… पेरेंटिंग की ये खबर भी पढ़िए पेरेंटिंग- क्या हमारे लाड़-दुलार ने बेटे को जिद्दी बना दिया: उसकी शिकायतों से परेशान हैं, 5 साल के बच्चे को कैसे समझाएं जैसा कि आप महसूस कर रहे हैं कि अधिक लाड़-प्यार अनजाने में बच्चे को जिद्दी बना सकता है। ये बात सौ प्रतिशत सच है। इससे बिल्कुल भी इनकार नहीं किया जा सकता है। लेकिन कई बार किसी बात को लेकर बच्चे का पॉइंट भी सही हो सकता है। पूरी खबर पढ़िए…