पेरेंटिंग- मैंने पहले पति से तलाक लेकर की दूसरी शादी:10 साल का बेटा उदास, क्या करूं कि वो मेरी शादी और नए पिता को एक्सेप्ट करे

सवाल- मैं नई दिल्ली की रहने वाली हूं। मेरी उम्र 38 साल है। मैं तलाकशुदा महिला हूं। मेरी अरेंज मैरिज हुई थी। मैं अपनी शादी से बिल्कुल भी खुश नहीं थी। शादी के कुछ महीने बाद से ही मेरी अपने पति से आए दिन लड़ाई होने लगी थी। ऐसे में काफी समय तक रिश्ते को संभालते-संभालते मेरे धैर्य का बांध टूट गया और फिर मैंने तलाक ले लिया। तलाक के समय मेरा एक पांच साल का बेटा था, जो अब करीब 10 साल का है। तलाक के कुछ सालों बाद मैंने दूसरी शादी कर ली। मेरे दूसरे हसबैंड काफी अच्छे हैं। लेकिन दूसरी शादी के बाद से मेरा बच्चा गुमसुम सा रहने लगा है। मुझे लगता है कि वह मेरे नए रिलेशनशिप से खुश नहीं है। हालांकि वह बहुत शांत, बहुत प्यारा और दिल से बहुत अच्छा है। लेकिन मुझे उसकी उदासी समझ में आती है। हम दोनों अपनी तरफ से उसे कंफर्टेबल फील कराने की बहुत कोशिश करते हैं। लेकिन वह उतना खुश नहीं रहता है। इसका उसकी पढ़ाई पर भी असर पड़ रहा है। मेरा अपने पहले पति से रिश्ता अच्छा नहीं था, लेकिन वह एक अच्छे पिता थे। मेरा बेटा अपने पिता से काफी अटैच्ड है। हालांकि मैं बेटे को अपने पिता से मिलने से कभी नहीं रोकती हूं। लेकिन ये जो इस तरह की स्थिति बन रही है, इससे निपटने के लिए मैं क्या करूं? एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर जवाब- आपकी चिंता वाजिब है। हो सकता है कि बेटे को इस नए रिश्ते में असहज महसूस हो रहा हो। लेकिन इसके लिए सबसे पहले आपको यह समझना जरूरी है कि बच्चा जिस उम्र में इन बदलावों से गुजर रहा है, वह मेंटल और इमोशनल ग्रोथ के लिए बेहद संवेदनशील फेज है। आपने बताया कि आपका रिश्ता बतौर हसबैंड-वाइफ अच्छा नहीं था। लेकिन वह एक अच्छे पिता थे। शायद यही कारण है कि बच्चा अपने पिता से अटैच्ड है। जिस समय आपका तलाक हुआ, उस समय बच्चे की उम्र कम थी, इसलिए कोर्ट से आपको कस्टडी मिली। भले ही बच्चा आपसे भी उतना ही अटैच्ड है। लेकिन फिर भी पिता से अलग होने के बाद उसके दिमाग पर सदमा लगा है, उसको चोट पहुंची है। पिता से अलग होने के बाद ‘सेंस ऑफ लॉस’ से जूझ रहा बच्चा वह अभी उतना बड़ा नहीं हआ है कि अपने इमोशंस काे प्रोसेस कर सके। ऐसे में आपका बेटा अभी जिस चीज से गुजर रहा है, वह है ‘सेंस ऑफ लॉस।’ ये किसी प्रिय व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति के खो जाने के बाद होने वाली एक भावनात्मक पीड़ा और दुख की भावना है। सेंस ऑफ लॉस में दुख, उदासी, गुस्सा, निराशा, अकेलापन, गिल्ट और बेचैनी जैसी भावनाएं महसूस हो सकती हैं। चूंकि बच्चों का अपने पेरेंट्स के साथ सबसे ज्यादा और प्राइमरी अटैचमेंट होता है, इसलिए वह इससे उबर नहीं पा रहा है। बच्चे के इमोशंस को समझना जरूरी आपको यहां समझने की जरूरत है कि उसका उदास होना, उसका दुखी रहना और अकेला रहना, इसलिए नहीं है कि अभी कोई उसके साथ बुरा व्यवहार कर रहा है या उसके साथ कुछ दुखद घटनाएं हो रही हैं। बल्कि यह एक डीप ‘सेंस ऑफ लॉस’ है। चूंकि वह अभी बच्चा है, इसलिए अपनी भावनाओं को समझना और उन्हें जाहिर करना उसके लिए आसान नहीं है। ऐसे समय में बच्चे के इमोशंस के साथ कुछ गलतियां करने से बचना चाहिए। बच्चे को उसके बायलॉजिकल पिता से न करें दूर आपके सवाल से ऐसा लग रहा है कि आप इस परिस्थिति का समझने और उसे सुलझाने के लिए पूरी कोशिश कर रही हैं। इसके लिए सबसे जरूरी बात ये है कि बच्चे को उसके पहले पिता से उसके अटैचमेंट को लेकर कभी भी सवाल न करें। उससे ये कभी न कहें कि ‘वह अब तुम्हारे पापा नहीं हैं’, ‘उनसे नहीं मिलना है’, ‘वह खराब हैं।’ ऐसी किसी भी तरह की नेगेटिव बातें नहीं करनी चाहिए क्योंकि वह एक अच्छे पिता हैं। बच्चे और पिता का अपना एक खूबसूरत रिश्ता होता है, इसलिए दूसरे किसी को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। बच्चे के बायलॉजिकल पिता के साथ मिलकर करें को-पेरेंटिंग को-पेरेंटिंग बच्चे के पिता के साथ मिलकर ही की जानी चाहिए। उनको इसमें शामिल करना चाहिए। इसके अलावा तीनों लोग मिलकर काउंसलिंग के लिए थेरेपिस्ट के पास भी जा सकते हैं। साथ ही बायलॉजिकल पिता से बेटे के साथ थोड़ा और ज्यादा टाइम स्पेंड करने काे कहें। जरूरी नहीं कि वह 24 घंटे उसके साथ रहें, लेकिन हफ्ते या 2 हफ्ते में उन्हें एक बार जरूर उसके साथ वीकेंड बिताने को कहें। कुल मिलाकर ये समझिए कि बच्चे के जो मम्मी-पापा हैं, वही उसके प्राइमरी रिश्ते हैं तो उन दोनों के साथ हेल्दी रिश्ता होना चाहिए। तभी इस समस्या का समाधान आसानी से हो सकता है। नए पिता इस बात का रखें ध्यान इसके अलावा नए पिता को बच्चे के साथ एक दोस्त की तरह व्यवहार करना चाहिए। बच्चे से प्यार करें और उसका ख्याल रखें। लेकिन अगर बच्चा आपको पिता की तरह नहीं ट्रीट कर रहा है तो उसे फोर्स न करें कि वह आपको ही ‘पापा’ ही बोले। रिश्ते को समझने के लिए बच्चे को दें पर्याप्त समय कई बार बड़े अपने ट्रॉमा को अलग-अलग रूपों में बच्चे के ऊपर थोप रहे होते हैं, जो कि उन्हें नहीं करना चाहिए। आप समझदार हैं, इसलिए उसे इस रिश्ते को समझने के लिए पर्याप्त समय दें। हाे सकता है वक्त के साथ खुद ऑर्गेनिक तरीके से दोनों का रिश्ता विकसित हो। लेकिन इस चेंज को बच्चे को ऊपर तुरंत थोपिए मत कि ‘वह पापा तो गए, अब हम दोनों ही तुम्हारे मम्मी-पापा हैं।’ बच्चे को समय दीजिए। जब बच्चा उदास हो या अपने पापा को याद करे तो उसकी भावनाओं को खारिज न करें, बल्कि उसकी फीलिंग्स को समझें। उससे कहें कि ‘मैं समझ रहा हूं, तुम्हें पापा की याद आ रही है।’ इससे वह आपके साथ अपनी भावनाओं को खुलकर शेयर करेगा। यहां पर को-पेरेंटिंग के लिए तीनों (माता-पिता और नए पिता) का शामिल होना जरूरी है। बच्चे को उसके रियल फादर से डिटैच नहीं करना है, बल्कि उसके सेंस ऑफ लॉस को एड्रेस करना है। इसके साथ ही कुछ बातों का विशेष ध्यान रखें। जैसा कि आपने बताया कि बच्चे के इस व्यवहार का असर पढ़ाई पर भी पड़ रहा है तो इसके लिए स्कूल टीचर से बात करें। स्कूल में उसका व्यवहार कैसा है, क्या वह दोस्तों से मिल-जुल रहा है या अकेला रहता है। इन बातों की जानकारी लें। इससे आप बच्चे की मानसिक स्थिति को और बेहतर से समझ पाएंगे। जरूरत पड़ने पर काउंसलर की भी मदद ले सकते हैं। अंत में यही कहूंगी कि बच्चा नए रिश्ते को कब और कैसे स्वीकार करेगा, इसका कोई तय टाइमफ्रेम नहीं होता है। लेकिन आपका धैर्य, ईमानदारी और लगातार प्यार उसे धीरे-धीरे सहज बना सकता है। इसलिए बच्चे के साथ हमेशा कनेक्ट रहें, उसे ढेर सारा प्यार-दुलार दें। समय के साथ वह अपने आप नए रिश्ते को स्वीकार कर लेगा। ……………….. पेरेटिंग की ये खबर भी पढ़िए पेरेंटिंग- अमीर बच्चों की संगत से बिगड़ रहा बच्चा: बच्चे को बिना डांटे बुरी संगत से कैसे बचाएं, पेरेंटिंग साइकोलॉजिस्ट के 7 सुझाव इस उम्र में बच्चे पर बाहरी दुनिया का प्रभाव पड़ना आम बात है। जब तक बच्चा घर के लोगों के बीच रहता है, तब तक वह परिवार के तौर-तरीकों को अपनाता है। लेकिन जैसे ही वह बाहर की दुनिया में कदम रखता है। नए दोस्त, अलग लाइफस्टाइल और कई तरह की चीजें उसकी सोच पर असर डालने लगती हैं। पूरी खबर पढ़िए…