‘भाजपा संग कब तक टिकेंगे नीतीश-नायडू’:वर्ल्ड मीडिया को भी दिलचस्पी, NYT ने लिखा-राजा की तरह संसद आने वाले मोदी अब संविधान की शरण में

लोकसभा चुनाव 2024 में 10 साल बाद ऐसा हुआ कि जनता ने किसी पार्टी को बहुमत से नहीं नवाजा। 400 पार का दावा करने वाली भाजपा ने सबसे ज्यादा 240 सीटें तो जीतीं पर बहुमत का आंकड़ा (272) टच नहीं कर पाई। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने की वजह से भारत के चुनाव पर वैसे ही दुनिया की नजरें थीं। उम्मीद के उलट आए नतीजों ने भारत की राजनीति में दुनिया की दिलचस्पी को और बढ़ा दिया है। सरकार कैसे बनेगी, कितना चलेगी इस पर वर्ल्ड मीडिया में रोज कुछ न कुछ छप रहा है। रविवार को लगातार तीसरी बार केंद्र में NDA की सरकार बनेगी। मोदी प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे। पढ़िए दुनिया के बड़े मीडिया हाउस भारत में चल रहे पॉलिटिकल सर्किस का एनालिसिस कैसे कर रहे हैं। ‘मोदी के सुर नरम पड़े’ अमेरिकी मीडिया हाउस न्यूयॉर्क टाइम्स लिखता है, दिल्ली की राजनीतिक हवा बदल चुकी है। विनम्र पड़ चुके नरेंद्र मोदी तीसरी बार भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं। हमेशा किसी मसीहा की तरह बोलने वाले मोदी के सुर नरम पड़ चुके हैं। नतीजों का असर ये हुआ है कि अब टेलीविजन पर होने वाली बहस में एंकर विपक्ष को भी बोलने का समय देने लगे हैं। NYT लिखता है- मोदी के बहुमत खोने के बाद अब दूसरी पार्टियां भी लाइमलाइट को एन्जॉय कर रही हैं जो पहले सिर्फ प्रधानमंत्री को ही मिलती थी। NYT ने नए संसद के उद्घाटन वाले दिन (28 मई 2023) को मोदी की एंट्री और NDA के संसदीय दल के नेता चुने जाने वाले दिन (7 जून 2024) की एंट्री की तुलना की है। लिखा है- संसद के उद्घाटन के दिन मोदी ने किसी राजा की तरह एंट्री ली थी। माथे पर तिलक लगाए मोदी सबसे आगे अपने हाथ में राजदंड ;सेंगोल’ लेकर चल रहे थे। मंत्रों का उच्चारण करते हुए पंडित उनके पीछे थे। एक साल बाद 7 जून को जब बहुमत खोने के बाद मोदी संसद भवन की पुरानी बिल्डिंग में पहुंचे तो उन्होंने सबसे पहले संविधान को नमन किया। उनके संसदीय दल का नेता चुने जाने के दौरान जब भी कोई सीनियर लीडर स्पीच देने उठ रहा था तो मोदी भी उसके सम्मान में उठ रहे थे। न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है कि NDA सरकार में गठबंधन के दो मजबूत साथी TDP और JDU हैं। BJP को इन दो सहयोगी दलों पर बहुत ज्यादा निर्भर रहना होगा। अखबार लिखता है कि गठबंधन की ये दोनों ही पार्टियां BJP के लिए सबसे अहम हिन्दू एजेंडे पर सहमत नहीं हैं। ये दोनों पार्टियां पहले कई बार UCC, CAA-NRC, मुस्लिम रिजर्वेशन आदि मुद्दों पर BJP से अलग राय रखती आई हैं। अटल की याद आई
ब्रिटेन का मीडिया हाउस BBC लिखता है क्या रोबदार मोदी एक विनम्र नेता में तब्दील हो पाएंगे। बीबीसी लिखता है कि भारत की राजनीति में गठबंधन की सरकारें कोई नई बात नहीं है। यहां 6 से लेकर एक दर्जन पार्टियां मिलकर सरकारें बना चुकी हैं। भारत में 1989 से 2004 तक हुए आम चुनाव में किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था। 1989 से 1999 में तो 8 बार सरकार बनी और गिर गई। बीबीसी लिखता है कि गठबंधन की सरकारों में स्थिरता नहीं होने के बावजूद कुछ देश की अर्थव्यवस्था और ग्रोथ रेट में बड़े और अहम बदलाव हुए थे। भारत की पॉलिटिकल सिचुएशन पर सवाल उठाते हुए बीबीसी लिखता है। सवाल ये है कि हमेशा बहुमत से सरकार चलाने वाले मोदी क्या अपना रोबदार रवैया छोड़कर नीतीश और नायडू का साथ निभा पाएंगे। काफी लोगों को उम्मीद है कि मोदी के नेतृत्व वाली गठबंधन की सरकार से भारत का लोकतंत्र मजबूत होगा। इससे देश के लिए फैसले लेने में मोदी का दबदबा खत्म होगा। ब्यूरोक्रेस, ज्यूडिशियरी और मीडिया और मजबूत होंगे। बीबीसी ने अटल बिहारी के नेतृत्व वाली सरकार को याद किया है। लिखा है- 1998 से 2004 के रही उनकी सरकार मोदी के लिए उदाहरण है। इस दौरान भारत में विदेशी निवेश बढ़ा, कई एक्सप्रेस वे बनाए, व्यापार नीतियों को आसान किय गया और भारत में आईटी क्रांति की शुरुआत हुई। उन्होंने पाकिस्तान से भी रिश्ते सुधारने की कोशिश की। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि अटल अपने सहयोगियों की सहमति के साथ काम किया। चंद्रबाबू नायडू की डिमांड्स को विशेष रूप से जगह दी है। ब्रिटिश मीडिया ने लिखा है कि 2018 में TDP ने अपनी मांगें न पूरी होने के चलते NDA गठबंधन छोड़ दिया था। वह आम चुनाव से कुछ समय पहले ही गठबंधन का हिस्सा बने हैं। फिलहाल BJP को समर्थन देने के लिए चंद्रबाबू नायडू की पार्टी ने लोकसभा स्पीकर का पद मांगा है। इसके साथ ही उसने सरकार में अहम मंत्रालयों पर दावा ठोक दिया है और आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग भी उठाई है। नीतीश अपना हक जरूर वसूलेंगे
द वॉशिंगटन पोस्ट में मिलन वैष्णव लिखते हैं कि बीजेपी सरकार अब बुरी तरह से अपने दो सहयोगियों की ‘अच्छाइयों’ पर निर्भर हो गई है। इन दोनों सहयोगियों से हम उम्मीद कर सकते हैं कि सरकार गठन के साथ-साथ वे नीतियों को लागू करने में भी अपना पूरा हक वसूलेंगे। कभी ब्रेक अप तो कभी पैचअप वाले नीतीश
अलजजीरा लिखता है कि BJP को बिहार में बड़ी जीत दिलाने में CM नीतीश कुमार की बड़ी भूमिका रही है। PM मोदी ने भी मंगलवार शाम को पार्टी समर्थकों से बात करते हुए नीतीश कुमार को इसका श्रेय दिया। लेकिन फिर भी दोनों ही नेताओं के बीच लंबे समय से प्यार-नफरत का रिश्ता रहा है, जिसमें अक्सर ब्रेकअप-पैचअप की गुंजाइश रहती है। नीतिश कुमार की तरह चंद्र बाबू नायडू ने भी BJP और कांग्रेस दोनों के साथ गठबंधन किया है। दोनों ही नेता मुस्लिम वोटरों का समर्थन चाहते हैं और BJP की हिंदूवादी राजनीति पर भरोसा नहीं करते हैं।