रिलेशनशिप- किशोर बच्चों को हो सकती है ‘आइडेंटिटी क्राइसिस’:करण जौहर भी इससे गुजर चुके हैं, पेरेंट्स कैसे दें बच्चों को इमोशनल सपोर्ट

फिल्म निर्माता करण जौहर बॉलीवुड की जानी-मानी हस्तियों में से एक हैं। उनका जीवन भले ही सफलताओं और खुशियों से भरा हो, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि उन्होंने जीवन में असफलताओं और असुरक्षा का सामना नहीं किया। बहुत से बच्चों की तरह किशोरावस्था में उनका जीवन भी कई मुश्किलों से गुजरा है। एक इंटरव्यू में करण जौहर ने बताया कि कैसे किशोरावस्था में उन्हें आइडेंटिटी क्राइसिस का सामना करना पड़ा। साथ ही उन्होंने अपने माता-पिता को भी निराश करने का दुख जताया। अपने बचपन के बारे में बात करते हुए करण जौहर ने कहा, “मैं अपने पड़ोस और स्कूल के दूसरे लड़कों से अलग था। मुझे स्पोर्ट्स में दिलचस्पी नहीं थी, और इसलिए मैं बस अपना सिर किताबों में गड़ाए रहता था। और फिर मैंने बहुत सारी हिंदी फिल्में देखीं। मैं मिलनसार नहीं था, मैं एक्सट्रोवर्ट नहीं था। मैंने अपने माता-पिता को भी निराश किया था।” करण जौहर की तरह कई बच्चे उम्र के उस दौर में अपनी पहचान बनाने के लिए स्ट्रगल कर रहे होते हैं। कई बार उन्हें दूसरों से कंपेयर किया जाता है, उन्हें स्कूल में, घर में, फ्रेंड सर्कल में अपने आपको एडजस्ट करने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। कई बार ऐसे बच्चे बुली का शिकार भी हो जाते हैं। यह बात बहुत कम पेरेंट्स ही समझ पाते हैं। अगर समझ भी पाते हैं तो उससे उबरने में अपने बच्चे की मदद नहीं कर पाते हैं। तो आज ‘रिलेशनशिप’ कॉलम में बात करेंगे कि कैसे बचपन में बच्चे आइडेंटिटी क्राइसिस का शिकार हो सकते हैं। साथ ही जानेंगे कि ऐसे बच्चे जो इस प्रॉब्लम से गुजर रहे होते हैं, उनके माता-पिता इससे कैसे डील कर सकते हैं। वे कैसे बच्चों का सपोर्ट सिस्टम बन सकते हैं। रिसर्चगेट की एक स्टडी के मुताबिक, आइडेंटिटी क्राइसिस एक व्यक्तिगत और मनोसामाजिक (साइकोसोशल) संघर्ष है, जो किशोरावस्था के दौरान होता है। हालांकि यह उम्र के किसी भी दौर में हो सकता है। इस अध्ययन का उद्देश्य किशोरों द्वारा फेस की जाने वाली आइडेंटिटी क्राइसिस के विभिन्न पहलुओं की पहचान करना था। स्टडी में 10 से 19 साल के आयु वर्ग के 160 किशोरों (88 लड़के और 72 लड़कियां) से इस विषय पर बात की गई। स्टडी में पाया गया कि ज्यादातर किशोरों को औसतन व्यक्तिगत, रिलेशनल और सामूहिक पहचान में दिक्कतों का सामना करना पड़ा। इस विषय पर हमसे भोपाल की करियर काउंसलर डॉ. अनुपमा माहेश्वरी ने भी विस्तार से बात की। मनोविज्ञान में आइडेंटिटी क्राइसिस की अवधारणा सबसे पहले 1902 में अमेरिका में जन्मे मनोवैज्ञानिक एरिक एरिकसन ने दी थी। उनका मानना ​​था कि पहचान का निर्माण लोगों के सामने आने वाले सबसे बड़े संघर्षों में से एक है। एरिक एरिक्सन के अनुसार, आइडेंटिटी क्राइसिस खुद को कई तरह से देखने का तरीका है। एरिक्सन ने कहा कि किशोरावस्था के दौरान पहचान की भावना विकसित करना जरूरी है। हालांकि पहचान का निर्माण और विकास किशोरावस्था तक ही सीमित नहीं है। हमारी पहचान जीवन भर बदलती रहती है क्योंकि लोग नई चुनौतियों का सामना करते हैं और अलग-अलग अनुभवों से गुजरते हैं। इस प्रकार, आइडेंटिटी क्राइसिस किसी भी उम्र में हो सकती है। नीचे ग्राफिक में देखें क्या हैं, आइडेंटिटी क्राइसिस के लक्षण- पहचान कैसे विकसित होती है एरिक एरिक्सन का मानना ​​था कि पहचान अलग-अलग व्यवहार और भूमिकाओं के साथ-साथ सामाजिक तौर-तरीकों से भी बनती है। शोधकर्ता जेम्स मार्सिया ने एरिक्सन के सिद्धांतों को आगे बढ़ाते हुए सुझाव दिया कि पहचान और भ्रम के बीच संतुलन अपनी पहचान के प्रति कमिटमेंट बनाने जितना है। ‘आइडेंटिटी क्राइसिस’ के कारण आइडेंटिटी क्राइसिस ज्यादातर किशोरावस्था के दौरान होता है, जिसमें किशोर पहचान से जुड़े कई सवालों और विचारों से जूझ रहे होते हैं। आज की बदलती दुनिया में आइडेंटिटी क्राइसिस एरिक्सन के दिनों की तुलना में ज्यादा आम हो सकती है। ऐसी प्रॉब्लम अक्सर किसी व्यक्ति के जीवन में अचानक आए बदलाव के कारण होती है। इसमें व्यक्तिगत जीवन में बदलाव या कुछ बड़ी सामाजिक घटनाएं शामिल हो सकती हैं। आइडेंटिटी क्राइसिस में व्यक्ति की पहचान और स्वयं को जानने की भावना को चुनौती दी जाती है। इसका उपचार व्यक्ति की स्थिति और उसकी पहचान के संघर्ष के कारणों के मुताबिक होता है। अगर समस्या ज्यादा गंभीर हो जाती है तो थेरेपी का भी सहारा लेना पड़ सकता है। इससे जूझ रहे व्यक्तियों के लिए ऑनलाइन थेरेपिस्ट से परामर्श करना मददगार साबित हो सकता है। इसमें व्यक्ति के विचारों और भावनाओं का पता लगाया जाता है। उनके बिहेवियर पैटर्न की पहचान की जाती है, जो उन्हें पीछे खींच रहे होते हैं। साथ ही उनकी समस्या क्या है, इसके बारे में जानने के बाद ही परामर्श दिया जाता है।