पिछले दिनों बॉलीवुड एक्ट्रेस सोनाक्षी सिन्हा अपने बॉयफ्रेंड जहीर इकबाल के साथ शादी के बंधन में बंधीं। कायदे से खबर यहीं पर या फिर शादी के चर्चे, मेहमानों की फेहरिस्त और मुबारकबाद पर ही खत्म हो जानी चाहिए थी। जैसा आमतौर पर किसी भी सेलिब्रिटी वेडिंग में होता है। लेकिन सोनाक्षी-जहीर की शादी के साथ ऐसा नहीं हुआ। मुबारकबाद की बजाय उन्हें नकारात्मक कमेंट्स और ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा। अंतरधार्मिक शादी होने की वजह से यह जोड़ा सोशल मीडिया पर ट्रोलर्स के निशाने पर रहा। कुछ ने सोनाक्षी के ट्रॉली बैग में पैक होने की भविष्यवाणी की तो कुछ ने उन्हें धर्म बदल लेने की सलाह दे डाली। दोनों ही तरफ से इस शादी के आलोचक सिर्फ एक ही बात पर खफा थे कि उन दोनों का मजहब अलग है। आखिरकार सोनाक्षी के पिता शत्रुघ्न सिन्हा ने अपने चिर-परिचित अंदाज में ट्रोलर्स को ‘खामोश’ रहने की सलाह दी। हर तरह की जाति, धर्म, नस्ल की पहचान से ऊपर उठकर सिर्फ प्यार की जमीन पर फले-फूले और बने रिश्ते तो पहले भी रहे हैं, लेकिन पहले सोशल मीडिया नहीं था और न ही ट्रोलर्स थे। मुहल्ले के दो-चार लोग आपस में कानाफूसी तब भी करते रहे होंगे, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर किसी की निजी जिंदगी को निशाना बनाने की घटनाएं तब नहीं होती थीं। दो लोग प्यार में हैं। दो प्यार करने वाले शादी कर रहे हैं। ऐसे में कितना मुश्किल है अपना पक्ष चुनना। प्यार के साथ खड़े होना, प्यार की मुबारकबाद देना और प्यार की खुशी में शामिल होना। लेकिन इतनी मामूली सी बात न समझकर लोग गालियां देने और ट्रोल करने में लगे हुए थे। यहां बात सिर्फ सोनाक्षी-जहीर तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया पर जो लोग इस तरह की नकारात्मक बातें लिख रहे हैं, इसका असर खुद उनकी जिंदगी पर भी नकारात्मक ही पड़ रहा है। सोशल मीडिया के खतरों से आगाह कर रही कई इंटरनेशनल स्टडीज ये कहती हैं कि सोशल मीडिया सामान्य रिश्ते बनाने और निभाने की मानवीय संभावनाओं को काफी हद तक प्रभावित कर रहा है। स्टनैफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक स्टडी कहती है कि सोशल मीडिया पर फैल रही टॉक्सिसिटी मानवीय रिश्तों पर नकारात्मक असर डाल रही है। आज रिलेशनशिप कॉलम में बात करेंगे, सोशल मीडिया ट्रोलिंग के रिश्तों पर पड़ने वाले असर की। प्रोफेशनल और पर्सनल रिश्ते में फैल रहा सोशल मीडिया का जहर सोशल मीडिया का जहर हमारे तमाम रिश्तों को प्रभावित कर रहा है। साइकोलॉजी टुडे की एक रिपोर्ट बताती है कि सोशल मीडिया लोगों में रिश्तों को लेकर स्टीरियोटाइप का निर्माण करता है और उसे बढ़ावा देता है। यानी सोशल मीडिया की वजह से लोगों के मन में किसी समुदाय या वर्ग के लोगों के प्रति खास तरह का पूर्वाग्रह बन सकता है। जब लोग इस पूर्वाग्रह का शिकार होते हैं तो उनके मन में इसका गहरा असर होता है। बाद में यही असर उनके रिश्तों पर दिखाई देने लगता है। भविष्य में अगर उसी समुदाय या वर्ग के किसी शख्स के साथ उन्हें प्रोफेशनल, पर्सनल या सोशल रिलेशनशिप बनाना पड़े तो उन्हें दिक्कतें पेश आती हैं। उदाहरण के लिए मान लीजिए सोनू नाम के किसी शख्स के मन में यहूदी धर्म के प्रति यह पूर्वाग्रह है कि यहूदी युद्ध समर्थक होते हैं। ऐसे में अगर कभी भविष्य में सोनू को यहूदी बॉस, कलीग, जूनियर या दोस्त के साथ काम करने का मौका मिले तो उसे मुश्किलें पेश आएंगी। घर, दफ्तर, पार्क या किसी भी जगह जहां कोई यहूदी मौजूद हो, सोनू सोशल रिलेशनशिप के मामले में वहां पीछे रह सकता है। जबकि तथ्यात्मक और तार्किक ढंग से सोचने वाला कोई व्यक्ति ऐसे पूर्वाग्रह नहीं रखेगा। वह हर इंडीविजुअल को उसके पर्सनल मेरिट के आधार पर देखेगा और उसी बुनियाद पर उसका आंकलन करेगा। एक अलग दुनिया में ले जाता है सोशल मीडिया अमेरिका के एक वेलनेस इंस्टीट्यूट ‘माइंड एंड बॉडी कंसल्टिंग’ की रिपोर्ट बताती है कि सोशल मीडिया पर्सनल, प्रोफेशनल, सोशल हर तरह के रिश्ते को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है। सोशल मीडिया के टॉक्सिक माहौल और ट्रोलर्स की वजह से लोग एक खास तरह से सोचने लगते हैं। उनकी यह सोच सच्चाई के बिल्कुल उलट भी हो सकती है। उनके मन में अपने या किसी और के शरीर, नस्ल, जाति, धर्म या क्षेत्र के प्रति हीनभावना या पूर्वाग्रह घर कर सकता है। वे दूसरी ओर की सच्चाई से पूरी तरह मुंह फेर लेते हैं। ऐसे में जब वे अपनी सोच को रिलय लाइफ में अप्लाई करने की कोशिश करते हैं तो मुश्किलें पेश आती हैं। उनके पर्सनल, प्रोफेशनल और सोशल रिश्ते बिगड़ जाते हैं। कोई दूल्हा या दुल्हन चुनने में बने-बनाए ढर्रे से अलग रुख अपनाए तो उसे सोशल मीडिया पर निशाना बनाया जाता है। उन्हें ट्रोलिंग का शिकार भी होना पड़ सकता है। लेकिन रिसर्च का मानना है कि शादी अपने नस्ल, समुदाय और क्षेत्र से जितनी दूर की जाए, उतना बेहतर है। रिश्ते में हो जेनेटिक वैरिएशन तो बच्चे होंगे एक्स्ट्राऑर्डिनरी अमेरिका में साल 2015 में 3 लाख लोगों पर एक बड़ी स्टडी हुई। डॉ. डेविड ऑगस की इस स्टडी में पाया गया कि अगर मां-बाप के जीन में पर्याप्त वैरिएशन यानी फर्क हो तो इस रिश्ते से पैदा होने वाले बच्चे बाकी बच्चों की तुलना में ज्यादा मजबूत होते हैं। इस रिसर्च में पाया गया कि मां और पिता के बीच नस्ल, समुदाय, जीन के मामलों में जितना ज्यादा फर्क होगा, बच्चा जेनेटिक रूप से उतना ही मजबूत पैदा होगा। आने वाली पीढ़ियां मजबूत होती जाएंगी। इसका अर्थ है कि दुनिया भर में विभिन्न जातियों, धर्मों, नस्लों, समुदायों और राष्ट्रों के लोगों के बीच विवाह संबंध बुरे नहीं, बल्कि जेनेटिक रूप से अच्छे हैं। विज्ञान भी इस बात की पुष्टि करता है। शादियों को लेकर दुनिया की लगभग हर संस्कृति में कुछ रूढ़िवादी नियम-कायदे रहे हैं। आजकल इन रूढ़िवादी नियमों से अलग हटकर शादियां हो रही हैं। लेकिन इसके लिए मानवता को लंबा संघर्ष करना पड़ा है। अमेरिका में अश्वेत महिला से शादी के बाद बेडरुम में घुसी पुलिस साल 1950-60 के दशक तक अमेरिका में गोरे और अश्वेत लोगों के बीच शादियां नहीं होती थीं। लेकिन साल 1958 में रिचर्ड नाम के एक गोरे शख्स ने ब्लैक महिला से शादी की। लेकिन उस वक्त तक ऐसी शादियों का कोई कानूनी आधार नहीं था। जैसे ही पुलिस को इस शादी के बारे में खबर हुई, पुलिस ने उसके बेडरुम में घुसकर रिचर्ड को गिरफ्तार कर लिया। उन्हें एक साल की सजा सुनाई गई। उसके बाद यह जोड़ा अपनी शादी को मान्यता दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट गया। 1967 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आया, जो ‘लविंग फेवर’ के नाम से मशहूर हुआ। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने अंतरनस्लीय शादी पर लगी रोक को गैरकानूनी और असंवैधानिक घोषित किया। इसके बाद अमेरिका में अंतरनस्लीय शादियां आम हो गईं। एक सर्वे के मुताबिक मौजूदा वक्त में 90% अमेरिकी गोरों और कालों के बीच विवाह का समर्थन करते हैं और यहां मिली-जुली नस्ल के बच्चों की संख्या 10% से अधिक हो गई है। अगर हम भी सोशल मीडिया ट्रोलर्स की बकवास सुनने की बजाय विज्ञान और इतिहास की किताबें पढ़ें, दुनिया भर में बेहतर मानवीय समाज बनाने के लिए लड़ी गई मनुष्यता की लड़ाइयों की कहानी पढ़ें तो हम प्यार और सुंदरता में यकीन करेंगे। हम धरती के किसी भी कोने में दो प्यार करने वालों के साथ खड़े होंगे। उनके प्यार को प्यार की नजर से देखेंगे और उस प्यार की इज्जत करेंगे। न कि सोशल मीडिया ट्रोलर्स के बहकावे में आकर अपनी मानसिक और भावनात्मक सेहत खराब करेंगे।