एयर इंडिया की एक्सप्रेस फ्लाइट आईएक्स 1344 के एक्सीडेंट की खबर जब शुक्रवार रात को कोझीकोड इंटरनेशनल एयरपोर्ट से बाहर आई, तब माना जा रहा था कि इस हादसे की वजह टेबलटॉप रनवे है। ज्यादातर एयरपोर्ट यूजर्स जानते हैं कि कारीपुर एयरपोर्ट पहाड़ी इलाके में है और वहां टेबलटॉप रनवे है, जिसे छोटी सी पहाड़ी काटकर बनाया गया है।
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, वंदे भारत मिशन के तहत 180 पैसेंजर को लेकर जा रहे इस एयरक्राफ्ट के एक्सीडेंट का कारण रनवे का टाइप नहीं है। जैकब फिलिप कतर में रहने वाले भारतीय एविएशन एनालिस्ट हैं। वे कहते हैं इस एक्सीडेंट की वजह टेबलटॉप रनवे नहीं, बल्कि भारी बारिश की वजह से गलत टचडाउन जोन चुनना हो सकता है।
ये फैक्ट है कि टेबलटॉप रनवे की वजह से एक्सीडेंट की ग्रेविटी कई गुना बढ़ गई, लेकिन जो भी इंफॉर्मेशन हासिल हुई हैं, उनके मुताबिक एक्सीडेंट की वजह रनवे का टाइप नहीं है। दुबई से आ रही फ्लाइट की शुक्रवार शाम 7 बजे लैंडिंग होनी थी। इलाके में भारी बारिश हो रही थी। कोझीकोड एयरपोर्ट का 2996 मीटर लंबा रन वे नॉर्थ वेस्ट-साउथ ईस्ट डायरेक्शन में पड़ता है।
आईएक्स 1344 साउथ ईस्ट डायरेक्शन से लैंडिंग के लिए आ रहा था। लेकिन मौसम इतना ज्यादा खराब था कि इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम भी मदद नहीं कर पाया। इसलिए पायलट ने तय किया कि वो एक बार आसमान में चक्कर लगाकर दोबारा लैंडिंग की कोशिश करेंगे। इसके 30 मिनट बाद दूसरी ओर से लैंडिंग करना तय किया।
मौसम की रिपोर्ट के मुताबिक इस वक्त तक बारिश थम गई थी। पायलट्स को दी गई मौसम की जानकारी में भी लाइट रेन यानी हल्की बरसात का जिक्र है। रिपोर्ट के मुताबिक, प्लेन जो मद्धम बरसात में लैंडिंग के लिए नीचे आया, उसने टचडाउन पॉइंट क्रॉस कर दिया। और जब टचडाउन किया, तो वह रनवे के बीच में पहुंच चुका था। काफी तेज रफ्तार के साथ प्लेन रनवे के आखिर में पहुंचा और गहराई में नाक के बल गिरकर एयरपोर्ट की दीवार से जा टकराया।
जैकब के मुताबिक जो रिपोर्ट्स हैं, उनसे ये साफ है कि एक्सीडेंट की दो ही वजह हो सकती हैं। पहली- प्लेन का ओवरशूट करना यानी रनवे पार कर जाना। दूसरी- रनवे के बीच में टचडाउन होने के बाद पायलट स्पीड कम नहीं कर पाए और प्लेन को रोक नहीं सके। यदि प्लेन ने रनवे पर सही जगह पर टचडाउन किया होता तो शायद ये एक्सीडेंट नहीं होता।
सही जगह पर टचडाउन नहीं होने की भी दो वजहें हैं। पहली टेल विंड यानी पीछे की ओर से फ्लाइट के डायरेक्शन में बहती हवा। दूसरी हाईड्रोप्लेनिंग यानी रनवे पर पानी जमा होने से भ्रम होना। मौसम की रिपोर्ट के मुताबिक हवा की रफ्तार 12.7 नॉट्स थी और स्लोप 260 डिग्री पर था। प्लेन रन वे नंबर 10 पर 260 डिग्री स्लोप में ही आ रहा था। बोइंग 737-800 सिर्फ 12-15 नॉट्स की विंड स्पीड बर्दाश्त कर सकता है।
हाईड्रोप्लेनिंग लैंडिग के लिए तब खतरनाक हो सकती है, जब रनवे पर पानी की परत 3 एमएम मोटी हो। लेकिन मौसम की जानकारी के मुताबिक बारिश धीमी थी। एक और कारण ये हो सकता है कि रनवे पर फ्लाइट के लैंडिंग गियर से निकला रबर मौजूद हो, जिससे फिसलन बढ़ गई हो। रनवे के आखिरी छोर पर रबर मिला है जो कि टचडाउन एरिया था। तो ऐसी कई वजहें हो सकती हैं, जो बताती हैं कि टेबलटॉप कारण नहीं है।
जैकब के मुताबिक इस बात पर भरोसा नहीं करने की कोई वजह ही नहीं कि मौतें कम होतीं, अगर प्लेन 35 फीट नीचे खाई में नहीं गिरता। ऐसे कई हादसे हुए हैं जहां बिना गहराई में गिरे भी बहुत सारी जानें गई हैं।
1990 में इंडियन एयरलाइन्स की फ्लाइट बैंगलुरू में एयरपोर्ट की दीवार से टकरा गई, जिसमें 92 लोगों की मौत हो गई। मई 2020 में कराची में पाकिस्तान एयरलाइंस की फ्लाइट रनवे से बाहर लैंड हुई और उस हादसे में 98 पैसेंजर की मौत हो गई। अमेरिका के गुआम इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर 1997 में कोरियन एयर की फ्लाइट रनवे से पहले ही लैंड हो गई और 254 लोगों की मौत हो गई।
इनमें से किसी भी एयरपोर्ट पर टेबल टॉप रन वे नहीं था। फ्लाइट्स रनवे पर लैंड करवाई जाती हैं और पायलट्स को इसी की ट्रेनिंग दी जाती है। बावजूद इसके एक्सीडेंट की आशंका हमेशा रहती है।
कोझीकोड का टेबलटॉप रन वे तभी से चर्चा में था जब 2010 में मैंगलोर में एयर इंडिया की एक एक्सप्रेस फ्लाइट में आग लग गई थी। ये दोनों एक्सीडेंट्स लगभग एक जैसे हैं। मैंगलोर में फ्लाइट में आग लगी थी और इस एक्सीडेंट में वो टुकड़ों में टूट गया। दोनों ही हादसों में फ्लाइट गहराई में जाकर गिरी थी।
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