राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत के भाई अग्रसेन की फर्म पर जिस मामले में 2009 में कस्टम ने 5.45 रुपए का जुर्माना लगाया था। अब उस मामले में 11 साल बाद प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की एंट्री हुई है। दरअसल, चौंकाने वाली बात ईडी की एंट्री की टाइमिंग है, क्योंकि सियासी मैदान में अशोक गहलोत अभी सचिन पायलट खेमे और अप्रत्यक्ष तौर पर भाजपा से घिरे हुए हैं। लड़ाई हाईकोर्ट से अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है।
हालांकि, अग्रसेन शुरू से ही इस मामले में खुद को बेदाग बताते रहे हैं। वे कहते हैं कि मुख्यमंत्री का भाई होने के कारण उन्हें बेवजह बदनाम किया जा रहा है। ईडी की एंट्री को कांग्रेस भी दबाव बनाने की कार्रवाई बता रही है।
अग्रसेन गहलोत घेरे में क्यों?
मुख्यमंत्री के भाई अग्रसेन गहलोत पर आरोप है कि 2007 से 09 के बीच फर्टिलाइजर बनाने में अहमएक प्रोडक्ट को किसानों में बांटने के नाम पर सरकार से सब्सिडी पर खरीदा गया। इस प्रोडक्ट को निजी कंपनियों को बेचकर मुनाफा कमाया। उस समय अशोक गहलोत राजस्थान के मुख्यमंत्री थे और केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार थी।
अग्रसेन की फर्म ने किसानों के नाम पर सरकार से सस्ती दर पर पोटाश खरीदी और उसका एक बड़ा हिस्सा कुछ अन्य फर्म के जरिए एक्सपोर्ट कर दिया।इस पोटाश को फैल्सपार पाउडर व इंडस्ट्रियल सॉल्ट बताकर एक्सपोर्ट किया गया था। इस मामले में कुछ अग्रसेन की फर्म के अलावा दूसरी फर्मों पर भी भारी जुर्माना लगाया गया था। इसके बाद इन फर्मों ने अहमदाबाद स्थित ट्रिब्यूनल में कमिश्नर के आदेश को चुनौती दी।
अग्रसेन की फर्म तक कैसे पहुंची शक की सुई?
- अहमदाबाद स्थित डायरेक्ट्रेट ऑफ रेवेन्यू के क्षेत्रीय कार्यालय को पता चला किएक एमओपी (खाद बनाने में इस्तेमाल पदार्थ) एक्सपोर्ट कर रही है। मलेशिया और ताइवान की फर्म को फैल्सपार और इंडस्ट्रियल सॉल्ट के नाम पर एमओपी एक्सपोर्ट किया गया। इसका इस्तेमाल नॉन यूरिया फर्टिलाइजरबनाने में किया जाता है।
- गुजरात के कांडला पोर्ट के कमिश्नर ने जांच में पाया कि इस पूरे मामले में एक सिंडिकेट काम कर रहा है। बड़े पैमाने पर किसानों का हक मारकर करोड़ों का घोटाला किया जा रहा है। इस मामले में सबसे पहले दिनेश चन्द्र अग्रवाल का नाम सामने आया था। उससे पूछताछ के बाद ही जांच एजेंसियां पूरे मामले की तह तक पहुंची थीं।
- कमिश्नर ऑफ कस्टम ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि इंडियन पोटाश लिमिटेड ने अग्रसेन गहलोत की फर्म को अपना डिस्ट्रिब्यूटर बनाया था। उसके जरिए किसानों को सस्ती दर पर एमओपी दी जानी थी।
- अग्रसेन की फर्म ने अपने दस्तावेजों में दिखाया कि एमओपी को किसानों को बेची गई है। पर बिक्री अहमदाबाद की कुछ फर्म को की गई, जिन्होंने इसे एक्सपोर्टकर दिया।फर्मों ने पैकिंग बदलकर दूसरे प्रोडक्ट के नाम से एमओपी एक्सपोर्ट कर दी।
- रिपोर्ट के मुताबिक, अग्रसेन की फर्म को सारा पेमेंट नकद किया गया। इसमें बिचौलिये की भूमिका निभाने वाला व्यक्ति अग्रसेन का करीबी ही था। अग्रसेन ने अपने ऊपर लगे सारे आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया था। उनका कहना था कि किसी बिचौलिये ने किसानों के नाम पर उनसे एमओपी खरीदा था। अब उनकी जानकारी में यह नहीं है कि उसने इसे कुछ निर्यातकों को बेचा या फिर किसानों को।
- रिपोर्ट में कमिश्नर ने लिखा कि अग्रसेन बार-बार अपने बयान से पलट रहे हैं और सही जानकारी नहीं बता रहे हैंजबकि वह पूरे घोटाले से जुड़े रहे हैं।
गड़बड़ी में क्यों फंसी फर्म?
नियमों के मुताबिक, एमओपी का निर्यात नहीं किया जा सकता, क्योंकि भारत पूरी तरह से इसके इम्पोर्ट पर निर्भर है। इंडियन पोटाश लिमिटेड इसका इम्पोर्ट करती है और उसके जरिए ही किसानों में यह बांटी जाती है।

आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें