मेंटल हेल्थ– मैरिड हूं, दूसरी औरतों को फैंटेसाइज करता हूं:कभी धोखा नहीं दिया, फिर भी गिल्ट होता है, क्या मैं गलत कर रहा हूं

सवाल– मैं एक अर्बन, अपर मिडिल क्लास बैकग्राउंड से आता हूं। मेरी उम्र 39 साल है और मैं आईआईटी ग्रेजुएट हूं। अभी जो मेरी पत्नी हैं, वो मेरे साथ ही आईआईटी खड़गपुर में पढ़ी हैं। हम दोनों बेंगलुरू में रहते हैं और एक साइंस रिसर्च फर्म में काम करते हैं। शादी से पहले हम 7 साल तक रिलेशनशिप में थे और बहुत खुश थे। हम अक्सर हाइकिंग और एडवेंचर के लिए जाते थे। हमें एक-दूसरे की कंपनी अच्छी लगती थी। मुझे लगता था कि खुशी की ये फीलिंग हमेशा ऐसी ही रहेगी। लेकिन अब शादी के पांच साल बाद लगता है सबकुछ बदल गया है। अब हम पहले की तरह कुछ नया करने को लेकर एक्साइटेड नहीं रहते। मुश्किल से साल में एक बार कहीं घूमने जाते हैं। हमारे बीच इंटीमेसी भी अब रूटीन और बोरिंग हो गई है। ऐसा नहीं है कि मैं अपनी पत्नी से प्यार नहीं करता, लेकिन अब मैं अक्सर दूसरी महिलाओं के बारे में फैंटेसाइज करता हूं। ऐसा करके गिल्ट भी महसूस होता है। मैंने कभी अपनी वाइफ के साथ चीट नहीं किया, लेकिन अपनी फैंटेसीज को कंट्रोल नहीं कर पा रहा। इसका असर मेंटल हेल्थ पर भी पड़ रहा है। मैं अपने दिमाग को कैसे कंट्रोल करूं कि इस तरह के ख्याल न आएं। प्लीज हेल्प मी। एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर। जवाब– आपने जिस तरह अपने सवाल को आर्टिकुलेट किया है, उससे लगता है कि आप खुद काफी हद तक चीजों को देख–समझ पा रहे हैं। लेकिन यहां आपको एक एक्सपर्ट हेल्प की भी जरूरत है। शादी के पहले रिश्ते शादी के पहले जब रिश्ते की शुरुआत होती है तो उसमें एक तरह की नॉवेल्टी और आजादी होती है। दो व्यक्ति एक–दूसरे को जान रहे होते हैं। उनके पास डिसकवर करने के लिए बहुत कुछ नया होता है। केमिकली बात करें तो रिश्ते के उस फेज में डोपामाइन का लेवल भी बहुत हाई होता है। एक्साइटमेंट और खुशी महसूस करने में इस हॉर्मोन का भी बड़ा योगदान होता है। साथ में घूमना, एडवेंचर करना। ये सब चीजें इमोशनल और सेक्शुअल इंटीमेसी को बढ़ाती हैं। शादी के बाद रिश्तों का बदलना शादी के बाद जो चीज सबसे ज्यादा बदलती है, वो है जिम्मेदारियों का बढ़ना और स्पॉन्टिनिटी का कम हो जाना। दो लोग एक–दूसरे को इतनी अच्छी तरह जान–समझ चुके होते हैं कि सबकुछ प्रेडिक्टेबल हो जाता है। कोई नयापन नहीं रहता। सेक्शुअल रिलेशनशिप थ्रिल और एक्साइटमेंट की जगह स्थाई सुरक्षा और कंफर्ट में बदलती है। डोपामिन कम हो जाता है और ऑक्सिटोसिन और वैसोप्रेसिन हॉर्मोन का लेवल बढ़ता है। रिश्ते में नयापन और एक्साइटमेंट बनाए रखने के लिए लगातार साथ में जो एडवेंचर और इंवेस्टमेंट करने की जरूरत है, कपल वो करना बंद कर देते हैं। ऐसे में एक तरह की मोनोटोनी पैदा हो जाती है। सेक्शुअल फैंटेसीज: क्या ये नॉर्मल हैं? आपका सवाल बता रहा है कि अपनी सेक्शुअल फैंटेसीज को लेकर आपके मन में एक गिल्ट है। आपका सबकॉन्शस ब्रेन इसे गलत समझता है। तो आइए, सबसे पहले इसे ही डीकोड करने की कोशिश करते हैं। यहां सबसे जरूरी और महत्वपूर्ण है ये समझना कि सेक्शुअल फैंटेसीज इंसानों के सेक्शुअल वर्ल्ड का बहुत स्वाभाविक हिस्सा हैं। अमेरिकन साइकोलॉजिस्ट जस्टिन लेमिलर की 2018 की एक स्टडी के मुताबिक कमिटेड रिश्ते में रहने वाले तकरीबन 90% लोग सेक्शुअल फैंटेसीज करते हैं। इसमें महिलाएं और पुरुष दोनों शामिल हैं। लेकिन यहां सबसे जरूरी है ये समझना कि सेक्शुअल फैंटेसीज का मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि आप अपने रिश्ते में खुश नहीं हैं या चीट करना चाहते हैं। पूरी ईमानदारी से रिश्ता निभा रहे लोग भी सेक्शुअल फैंटेसीज कर सकते हैं। सेक्शुअल फैंटेसीज का लेवल– RIFI-S टेस्ट कभी-कभार ऐसी फैंटेसीज होना बिल्कुल नॉर्मल और हेल्दी है। लेकिन वहीं दूसरी ओर इनका लेवल ये भी बताता है कि कहीं आपका रिलेशनशिप किसी मुश्किल दौर से तो नहीं गुजर रहा है। इसके लिए एक RIFI-S (रिलेशनशिप इंटीमेसी एंड फैंटेसी इंपैक्ट स्केल) टेस्ट किया जाता है। इस टेस्ट से हमें स्थिति के लेवल और गंभीरता का अंदाजा मिलता है। मैं आपको सलाह दूंगा कि आप एक बार ये टेस्ट करें। पूरी ईमानदारी से सोचकर नीचे ग्राफिक में दिए सवालों का जवाब दें। ग्राफिक में 10 सवाल हैं। इन सवालों को आपको 1 से 5 तक के स्केल पर रेट करना है। 1 का मतलब है कि आप स्ट्रांगली असहमत हैं और 5 का मतलब है कि स्ट्रांगली सहमत हैं। स्कोर का इंटरप्रिटेशन भी ग्राफिक में दिया है। सेक्शुअल फैंटेसीज और अपरोध बोध सेक्शुअल फैंटेसीज हमेशा नुकसानदायक या खतरे का संकेत नहीं होतीं। ह्यूमन बिहेवियर और साइकोलॉजी की बहुत सी स्टडीज बताती हैं कि सेक्शुअल फैंटेसीज के फायदे भी हैं। ये सेक्शुअल डिजायर को बढ़ाती हैं और लांग टर्म रिलेशनशिप में लंबे समय तक लिबिडो को बनाए रखने में मदद करती हैं। इंसान का मन और उसका सेक्शुअल बिहेवियर किसी खांचे में बंधा हुआ नहीं होता। अगर उसमें विविधता और कल्पना न हो तो वो बहुत रूटीन, संकुचित और बोरिंग हो जाएगा। ये इंसान का स्वभाव है कि वो हमेशा कुछ नया खोजता है। सेक्शुअल फैंटेसीज एक तरह का नयापन लेकर आती हैं। आप पहले और इकलौते नहीं हैं, जो सेक्शुअल फैंटेसीज कर रहे हैं। सभी समाजों और संस्कृतियों में ये फैंटेसीज बहुत आम हैं। सभी मनुष्य इसका अनुभव करते हैं। दिक्कत ये है कि हमारे समाज में इस बारे में कभी बात नहीं होती। इसलिए ऐसी फैंटेसीज मन में आने पर लोग शर्म और अपराधबोध महसूस करने लगते हैं। गिल्ट इस गलत सोच से पैदा होता है कि “ऐसे ख्याल आने का मतलब है कि आप ऐसा कर रहे हैं।” जबकि ये सच नहीं है। सेल्फ हेल्प प्लान रीअल लाइफ रिलेशनशिप को बेहतर बनाने के लिए यहां मैं एक सेल्फ हेल्प प्लान दे रहा हूं। आपकी सेक्शुअल फैंटेसीज का लेवल सामान्य है या खतरे के निशान के बाहर, यह आपके सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट के स्कोर पर निर्भर है। यह प्लान किसी के लिए भी कारगर हो सकता है, जो अपने रिश्ते को बेहतर बनाना चाहते हैं। पहला हफ्ता: सोचें और स्वीकार करें दूसरा हफ्ता: फिजिकल और इमोशनल इंटीमेसी पर काम करें तीसरा हफ्ता: अपनी फैंटेसीज को एक्सप्लोर करना ये सब करने के कुछ दिन बाद अपना RIFI-S स्कोर चेक करें। अगर कोई इंप्रूवमेंट महसूस न हो तो कपल थेरेपी के लिए जाएं। क्या पार्टनर से सेक्शुअल फैंटेसीज शेयर करना ठीक है? इस सवाल का कोई अल्टीमेट जवाब नहीं हो सकता। यह दोनों पार्टनर्स की मैच्योरिटी और आपसी अंडरस्टैंडिंग पर निर्भर करता है। हमेशा ऐसा करना उचित नहीं होगा। अगर फैंटेसीज म्यूचुअल फ्रेंड्स, कुलीग या ऐसे व्यक्ति को लेकर हैं, जिसके बारे में आपका पार्टनर जानता है तो शेयर करना ठीक नहीं है। ऐसा करने से असुरक्षा, ईर्ष्या और क्रोध की भावना पैदा हो सकती है। सेक्शुअल फैंटेसीज तभी शेयर की जानी चाहिए, जब रिश्ते में बहुत गहरी इमोशनल सिक्योरिटी हो, आपसी सहमति हो और दोनों पार्टनर इस बारे में बात करने, जानने के लिए उत्सुक और मेंटली–इमोशनली तैयार हों। क्या अपनी सेक्शुअल फैंटेसीज को सीक्रेट रखना ठीक है? हां बिल्कुल। हर इंसान का अपना एक निजी साइकोलॉजिकल स्पेस भी होता है। उस स्पेस की प्राइवेसी को बनाए रखना और उसे पार्टनर से शेयर न करना बिल्कुल वाजिब है, लेकिन इसकी कुछ कंडीशंस भी हैं। जैसेकि– …………….
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