मंत्रिमंडल के गठन के साथ ही पंडित जवाहरलाल नेहरू के लगातार तीन बार शपथ लेने के रिकॉर्ड की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बराबरी कर ली है। मोदी के पहले कार्यकाल में पचास से कम मंत्री थे। दूसरे कार्यकाल में 58 मंत्रियों ने शपथ ली थी और तीसरी बार में प्रधानमंत्री सहित 72 मंत्री बनाए गए हैं। चुनाव परिणाम आने के बाद और गठबंधन सरकार के गठन से पहले जिस तरह के दबावों की चर्चा हो रही थी, शपथ समारोह मे वे तमाम दबाव दूर- दूर तक नज़र नहीं आए। पूरे खुले मन से सरकार बनाई गई। मंत्री भी बढ़े हैं तो भाजपा के ही बढ़े हैं। सभी घटक दलों की 72 के मंत्रिमंडल में मात्र 11 की हिस्सेदारी है। इस आँकड़े को देखकर तो लगता है दबाव में मोदी या भाजपा नहीं, बल्कि घटक दल हैं। खैर, भाजपा के सभी वरिष्ठ मंत्री जो पिछले कार्यकाल में सरकार में शामिल थे, वे इस सरकार में भी लाए गए हैं। भाजपा अध्यक्ष जय प्रकाश नड्डा, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान नए जुडे वरिष्ठ मंत्री हैं। माना जा रहा है कि इस बार का मंत्रिमंडल पहले से ज़्यादा अनुभवी है। प्रधानमंत्री को छोड़ दिया जाए तो कुल चौबीस राज्यों से 71 मंत्री बनाए गए हैं। भाजपा के कुछ राज्यसभा सदस्यों को भी मंत्री बनाया गया है। अमेठी से इस बार चुनाव हार चुकीं स्मृति इरानी को मंत्रिमंडल में मौका नहीं दिया गया है। अर्जुन मुंडा भी पिछली सरकार में वरिष्ठ मंत्री रहे थे, लेकिन इस बार चुनाव हारने के कारण वे भी सरकार का हिस्सा नहीं बन पाए। हरियाणा से भाजपा के पाँच सांसद जीते, इनमें से तीन को मंत्री बनाया गया। मध्य प्रदेश से इस बार पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को ज़्यादा तवज्जो दी गई। वे विदिशा संसदीय सीट से इस बार आठ लाख से भी ज़्यादा वोटों से जीते हैं। बहरहाल, सरकार का गठन जिस चतुराई से किया गया है, लगता है गठन पूर्व की तमाम आशंकाएँ धूमिल हो गई हैं। कहा जा सकता है कि नरेंद्र भाई मोदी पूर्ण बहुमत की सरकार चलाने में माहिर हैं तो गठबंधन सरकार चलाने में भी वे उतने ही चतुर साबित होंगे।