इंडियन क्रिकेट टीम के कप्तान रोहित शर्मा ने कोच राहुल द्रविड़ को अपनी ‘वर्क वाइफ’ बताया है। एक इमोशनल पोस्ट में रोहित ने द्रविड़ की तारीफ करते हुए लिखा कि मेरी पत्नी आपको मेरी वर्क वाइफ कहती है और भाग्यशाली हूं कि मैं भी आपको ऐसा कह पाता हूं। हालिया टी-20 वर्ल्डकप में टीम इंडिया की जीत में कोच राहुल द्रविड़ की अहम भूमिका रही और अब बतौर कोच उनका कार्यकाल खत्म हो रहा है। विदाई के मौके पर कप्तान की तरफ से उनकी तारीफ तो समझ आती है। लेकिन इस ‘वर्क वाइफ’ का क्या मतलब है और किस स्थिति में दो कलीग वर्क स्पाउस यानी कार्यक्षेत्र के पति-पत्नी बन जाते हैं। आज रिलेशनशिप कॉलम में वर्कप्लेस के इसी रिश्ते की बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि वर्क वाइफ और वर्क हसबैंड असली पति-पत्नी से किस तरह अलग होते हैं। जब कलीग से साथ बने ऐसी बॉन्डिंग तो उसे समझें वर्क स्पाउस ऑफिस वाइफ से घर की पत्नी को न हो कोई दिक्कत रोहित शर्मा और राहुल द्रविड़ के मामले में रोहित की वाइफ ने दोनों को ऑफिस हसबैंड-वाइफ का तमगा दिया। इसका मतलब है कि रोहित शर्मा की वाइफ इस रिश्ते से बाखबर हैं और उन्हें इससे कोई दिक्कत भी नहीं है। लेकिन क्या होता अगर राहुल द्रविड़ की जगह कोई महिला रोहित शर्मा की ‘वर्क वाइफ’ बन जाती। क्या ऐसी स्थिति में भी रोहित की वाइफ इस रिश्ते को सहज रूप से स्वीकार कर पातीं। इसका जवाब है, कोई भी शख्स जिसे वर्क स्पाउस का कॉन्सेप्ट पता हो और अपने पार्टनर पर पर्याप्त भरोसा हो, वह इस रिश्ते को शक की निगाह से नहीं देखेगा क्योंकि वर्क वाइफ-हसबैंड का रिश्ता प्लेटोनिक होता है। वर्क वाइफ की मदद से करियर में मिली बड़ी सफलता अमेरिका की रहने वाली एरिका सेरुलो और क्लेयर माजुर की मुलाकात कॉलेज में हुई और जल्दी ही दोनों अच्छी सहेलियां बन गईं। पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने साथ में काम करने और बड़ा मुकाम हासिल करने का सपना देखा। दोनों का यह सपना पूरा भी हुआ। आगे चलकर दोनों ने स्टोरी टेलिंग के क्षेत्र में काफी नाम कमाया। एरिका सेरुलो और क्लेयर माजुर एक-दूसरे को अपना वर्क स्पाउस मानते हैं। उन्होंने इस विषय पर एक किताब भी लिखी, जिसका नाम है- ‘वर्क वाइफ।’ इस किताब में एरिका और क्लेयर लिखती हैं कि अगर वर्कप्लेस पर कोई ऐसा साथी हो, जो दिल की बातें समझता हो तो इससे करियर में काफी फायदा हो सकता है। वर्क स्पाउस बनाना पार्टनर को धोखा देना तो नहीं ऑफिस वाइफ या ऑफिस हसबैंड शब्द का इस्तेमाल उन कलीग्स के लिए किया जाता है, जो आपस में काफी अच्छे दोस्त हों। आपस में काम और निजी जिंदगी से जुड़ी जानकारियां साझा करते हों। यह रिश्ता किसी भी रूप में रोमांटिक नहीं होता। इसमें दोनों पार्नटर्स के बीच किसी तरह का सेक्शुअल रिलेशन भी नहीं होता। ये सिंबॉलिक हसबैंड या वाइफ की तरह होते हैं। यह रिश्ता किसी भी तरह अपनी असली वाइफ या हसबैंड को धोखा देने जैसा नहीं है। वर्कप्लेस के क्लोज रिलेशनशिप के लिए अमेरिका में ‘ऑफिस वाइफ या ऑफिस हसबैंड जैसे शब्द का इस्तेमाल शुरू हुआ था, जो अब दुनिया भर में प्रचलित हो रहा है। दफ्तर में हों अच्छे साथी तो करियर में फायदा, सेहत रहती दुरुस्त वर्क स्पाउस के बारे में इतना समझने के बाद सवाल यह उठता है कि इससे पर्सनल और प्रोफेशनल लेवल पर क्या फायदे होंगे। इस बारे में कई रिसर्च हुई हैं, जो बताती हैं कि दफ्तर की क्लोज इमोशनल बॉन्डिंग्स प्रोडक्टिविटी बढ़ाने में मददगार साबित हो सकती है। वर्कप्लेस फ्रेंडशिप एंड हैप्पीनेस सर्वे (WFHS) में यह बात सामने आई कि ऑफिस में करीबी रिश्ते बनाने वालों पर वर्क प्रेशर का कम नकारात्मक प्रभाव नजर आता है। इसका सीधा असर वर्कप्लेस पर उनके मूड और उनकी सेहत पर पड़ता है। नतीजतन वो दूसरे एम्लॉइज के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन कर पाते हैं। आसान भाषा में कहें तो जिन लोगों के ऑफिस में ज्यादा दोस्त होते हैं, वे रोज काम पर जाने को लेकर उत्साहित रहते हैं। वे अकेले और अलग-थलग रहने वालों के मुकाबले कम बीमार पड़ते हैं। एक जैसा काम करने के बाद भी उन पर वर्कलोड कम रहता है। वर्कप्लेस फ्रेंडशिप एंड हैप्पीनेस सर्वे (WFHS) की रिपोर्ट यह भी बताती है कि ऑफिस में अगर पर्सनल या फ्रेंडली रिश्ते बनाए जाएं तो काम और जिंदगी की क्वालिटी में पॉजिटिल बदलाव आ सकता है। यानी इससे वर्क-लाइफ बैलेंस बेहतर हो सकता है।