रिलेशनशिप- दोस्तों की परख में कच्चे रणदीप हुड्डा:सच्चे दोस्त की 8 निशानियां, दोस्ती है या दिखावा, ऐसे कर सकते हैं पता

बॉलीवुड एक्टर रणदीप हुड्डा दोस्तों को पहचानने में अक्सर गलतियां कर बैठते थे। भावनाओं में बहकर गैरों को दोस्त मान लेते थे और उनके सामने अपने दिल की बातें भी कह देते थे। लेकिन कई गलतियों के बाद अब रणदीप दोस्तों को परखने में माहिर हो गए हैं। हाल ही में एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि वो पार्टी तो बहुत करते हैं, लेकिन बाहर नहीं, सिर्फ घर पर। रणदीप ने कहा, “करियर के शुरुआती दौर में मैंने बहुत बॉलीवुड पार्टी अटेंड कीं। मुझे बहुत बाद में पता चला कि ये तो नेटवर्किंग पार्टीज होती हैं और मैं वहां पार्टी करने जाता था। बॉलीवुड पार्टीज केवल नेटवर्किंग पार्टीज होती हैं, क्योंकि असली पार्टी तो आप अपने रियल फ्रेंड्स के साथ करते हैं, जिनके साथ आप कंफर्टेबल होते हैं।” रणदीप हुड्डा वाली गलतियां आप अपनी लाइफ में न करें, अपनों और गैरों की परख आसानी से कर पाएं, इसलिए आज ‘रिलेशनशिप’ कॉलम में बात करेंगे कि सच्चे दोस्तों को कैसे पहचानें। कैसे जानें कि कौन आपके साथ दोस्ती का दिखावा कर रहा है और कौन आपका सच्चा दोस्त है। अपनों और गैरों की परख इतनी जरूरी क्यों है जीवन में अच्छे और सच्चे दोस्त का होना एक सबसे सुंदर एहसास है। वो कहावत तो आपने सुनी ही होगी, जिंदगी में अगर दोस्त है तो क्या गम है। जब कहीं घूमने जाना हो तो दोस्त याद आता है। कैफे में बैठकर तफरी मारना हो तो दोस्त याद आता है। कभी मन उदास हो तो दोस्त याद आता है। दोस्तों से हम सारी बातें कर लेते हैं, उनके साथ अपने सारे सीक्रेट्स शेयर कर लेते हैं। कुछ हमारे बचपन के दोस्त होते हैं तो कुछ कॉलेज के। वहीं कुछ दोस्त ऑफिस में बन जाते हैं। लेकिन क्या हो अगर हम किसी ऐसे शख्स को अपना दोस्त मान बैठें, वास्तव में जिसके दिल में हमारे लिए कोई प्यार-लगाव ही न हो। बस एक दिखावा हो। ऐसे में ज्यादातर यही होता है कि हम तो दोस्त मानकर सारी बातें उन्हें बता देते हैं, लेकिन फिर वह हमारी निजी जानकारी और कमजोरी को जगजाहिर कर देता है। इसका खामियाजा हमें पर्सनल और प्रोफेशनल लेवल पर भुगतना पड़ सकता है। इसी वजह से सच्चे दोस्त की परख जरूरी हो जाती है। जो सबका होता है, वह वास्तव में किसी का नहीं होता एक पुरानी कहावत है कि ‘जो सबका होता है, वह असल में किसी का नहीं होता।’ आपको अपने आसपास कई लोग ऐसे दिखाई देंगे, जो हर किसी को अपना दिखाना चाहते हैं। वह ऐसा दिखावा करते हैं कि पूरी दुनिया ही उनकी दोस्त है। अपनी किताब ‘द आर्ट ऑफ ट्रू फ्रेंडशिप’ में एला ओबंस ऐसे लोगों से खासतौर से सावधान होने की सलाह देती हैं। एला ओबंस के मुताबिक दोस्ती भले जगजाहिर रिश्ता हो, लेकिन इसकी परख पर्सनल लेवल पर ही होती है। वहीं अरस्तू ने कहा है कि “दोस्त दो शरीरों में रहने वाली एक आत्मा है।” बेस्ट फ्रेंड, क्लोज फ्रेंड और सोशल रिलेशन में क्या है अंतर सोशियोलॉजिस्ट डॉ. जेन येजर ने फ्रेंडशिप और रिलेशनशिप पर कई चर्चित किताबें लिखी हैं। अपनी किताब ‘Friendgevity’ में उन्होंने बेस्ट फ्रेंड, क्लोज फ्रेंड और सोशल रिलेशन में अंतर बताया है। साथ ही इन रिश्तों में सही संख्या की भी पड़ताल की है। मुश्किल है एक सच्चा और वफादार दोस्त मिलना विलियम शेक्सपियर ने कहा है, “शब्द हवा की तरह आसान होते हैं, जो मुश्किल होता है वो है एक वफादार दोस्त मिलना”। विश्वसनीय और सच्चे दोस्त ढूंढना और उन्हें बनाए रखना किसी चुनौती से कम नहीं है। वर्कप्लेस पर दोस्ती अक्सर लेन-देन का रूप धारण कर लेती है और इसलिए, यह कहना मुश्किल हो जाता है कि नेटवर्किंग कहां खत्म होती है और वास्तविक मित्रता कहां से शुरू। जब हम चुनौतीपूर्ण समय और बड़े नुकसान या निराशा का सामना करते हैं तो स्वाभाविक है यह चाहना कि कोई हमारे लिए मौजूद रहे। ऐसे लोगों से अपेक्षा करते हैं कि वे बस हमारी बात सुनें या हमारे साथ घूमें और हमें याद दिलाएं कि जीवन जारी रहना चाहिए। ऐसे लोगों को हर समय तत्पर रहना चाहिए। तब भी जब हम खुशी के क्षणों का अनुभव कर रहे हों। ऐसे लोग ही सच्चे दोस्त कहलाते हैं। जापान में इसी तरह की एक अवधारणा है, जिसे ‘केंजोकू’ (Kenzoku) कहा जाता है, जिसका मतलब है ‘परिवार।’ यह उन लोगों के बीच दोस्ती के बंधन को बताता है, जिनकी एक जैसी किस्मत और कमिटमेंट्स हों। इसका आत्मीय भावना और गहरे संबंध से नाता है। जैसे अच्छी दोस्ती में जो गुण होने चाहिए, उसमें अच्छा कम्युनिकेशन भी शामिल है। अच्छा कम्युनिकेशन किसी भी अच्छी दोस्ती की बुनियाद है। इस मामले में, दोनों लोग स्पष्ट, खुले और सच्चे होते हैं। और यही सच्ची दोस्ती की निशानी होती है।