रिलेशनशिप- आने वाला है कफिंग सीजन:मौसम जिसमें गहराता प्यार का एहसास, लेकिन ऐसे मौसमी रिश्तों की उम्र लंबी नहीं होती

साल 1999 में अक्षय कुमार और करिश्मा कपूर की एक फिल्म आई थी- ‘जानवर।’ इस फिल्म में अलका याग्निक की आवाज से सजा एक गाना है- “मौसम की तरह तुम भी बदल तो न जाओगे।” प्रेम कहानियों में अक्सर पार्टनर्स को चिंता होती है कि कहीं उनका महबूब समय के साथ बदल तो नहीं जाएगा। बदल जाने के इसी डर की वजह से कसमों-वादों की एक पूरी दुनिया बस गई। लेकिन क्या वाकई ऐसा होता है? क्या प्रेमियों का मौसम की तरह बदल जाना संभव है और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या प्यार का मौसम से भी कोई संबंध है? आज रिलेशनशिप कॉलम में इन्हीं सवालों के जवाब जानने की कोशिश करेंगे। कफिंग सीजनः जब मौसम से बनते रिश्ते अभी आपके मन में यह सवाल उठ रहा होगा कि अचानक से मौसम और रिश्ते का जिक्र कहां से आ गया। दरअसल, बरसात के आगमन और गर्मी की धीमी विदाई के बीच एक अलग किस्म के मौसम ने भी दस्तक दी है। रिश्ते की भाषा में इसे ‘कफिंग सीजन’ कहते हैं। दरअसल, कफिंग सीजन की शुरुआत बरसात और सर्दी के बीच होती है और वसंत यानी वैलेंटाइंस डे के बाद यह खत्म हो जाता है। रोमांस के इस मौसम में डिजिटल दुनिया में पार्टनर की तलाश तेजी से बढ़ती है। क्या कफिंग वाले यार मौसम के साथ बदल जाते हैं आसान भाषा में कहें तो यह बात सही है। मौसमी प्रभाव के चलते बने इस तरह के रिश्तों की उम्र लंबी नहीं होती। यह एक तरह का शॉर्ट टर्म रिलेशनशिप होता है। साल 2017 में कोलिंस डिक्शनरी ने ‘कफिंग सीजन’ को वर्ड ऑफ द ईयर घोषित किया। जिसके बाद दुनिया भर में इसकी चर्चा हुई। इस दिशा में कई रिसर्च भी हुई हैं। हालांकि अभी इस बारे में कुछ भी दावे से नहीं कहा जा सकता है। लेकिन मनोवैज्ञानिकों और रिलेशनशिप कोच की आम राय है कि बरसात से वसंत तक का मौसम प्यार की कमी का एहसास कराने वाला होता है। लेकिन इस दौरान बने रिश्तों के लंबा चलने की उम्मीद कम होती है। क्योंकि ये रिश्ते सहज इच्छा से नहीं बल्कि मौसम की वजह से अस्तित्व में आते हैं। सीजनल अफेक्टिव डिसऑर्डर से बढ़ती रिश्ते की तलब कुछ खास मौसमों में रिश्ते की तलब बढ़ने की एक वजह सीजनल अफेक्टिव डिसऑर्डर भी हो सकती है। साइकोलॉजी टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक सीजनल अफेक्टिव डिसऑर्डर की स्थिति में लोग खाली और बेकार महसूस कर सकते हैं। लोगों पर इसका असर दो तरह से दिख सकता है। कुछ लोग ऐसी स्थिति में रिश्ते से खिन्न होकर पार्टनर से लड़ाई-झगड़ा कर लेते हैं। वहीं कुछ लोग खासतौर से सिंगल्स अपने खालीपन को रिश्ते से भरना चाहते हैं। ऐसे लोगों में मौसम की वजह से रिश्ते में आने की संभावना बढ़ जाती है। मौसमी प्यार लंबा क्यों नहीं टिकता साइकोलॉजी की दुनिया में प्यार को तीन अलग कैटगरीज में बांटकर देखा जाता है। ये तीन लेवल की तरह भी हैं। जैसे-जैसे प्यार बढ़ता है, ये जगह लेते जाते हैं। 1. लस्ट- पहली तरह का प्यार है लस्ट। यहां सिर्फ शारीरिक आकर्षण होता है। इस तरह के रिश्ते में माइंड और हार्ट की ज्यादा जरूरत नहीं होती। 2. अट्रैक्शन- दूसरी तरह का प्यार आकर्षण है। इसमें नशे की तलब जैसा एहसास होता है। यह रिश्ता माइंड और हार्ट के लेवल तक पहुंच भी सकता है और नहीं भी। 3. लगाव- तीसरे और आखिरी लेवल में साथी से लगाव हो जाता है। उसके साथ भविष्य की योजनाएं बनाते हैं। यह रिश्ता माइंड और हार्ट के लेवल तक पहुंचता है। आसान भाषा में समझें तो प्यार के 3 लेवल होते हैं। जब प्यार तीनों लेवल को पार कर जाता है तो पार्टनर्स सच्चे साथी में तब्दील हो जाते हैं। लेकिन कफिंग सीजन का प्यार पहले या ज्यादा-से-ज्यादा दूसरे लेवल तक ही पहुंच पाता है। यहां दो लोगों के बीच आकर्षण तो होता है, लेकिन आंतरिक लगाव नहीं होता। ऐसे में आकर्षण के खत्म होते ही प्यार का खुमार भी उतर जाता है। यही वजह है कि मौसमी प्यार समय के थपेड़ों को झेल नहीं पाते और ऐसे यार मौसम के साथ बदल जाते हैं। तो क्या मौसम प्रेमियों को बनाता है पागल कुछ वक्त पहले चीनी मीडिया में वहां के एक छात्र की कहानी खूब वायरल हुई थी। उस स्टूडेंट को लगता था कि उसकी क्लास की हर लड़की उसके प्यार में पागल है। दरअसल, वह छात्र डिल्यूजनल लव डिसऑर्डर नाम की मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम से जूझ रहा था। इस घटना की रिपोर्ट करते हुए ‘साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट’ में लिखा गया कि ‘’पूरी यूनिवर्सिटी की लड़कियों को अपनी प्रेमिका मानने वाले स्टूडेंट की इस कंडीशन की एक वजह मौसम भी है।’’ चीन के सरकारी अखबार ने यह बात मेडिकल एक्सपर्ट के हवाले से कही थी, जिसके मुताबिक बरसात से वसंत के बीच बॉडी में इंडोसिरीन लेवल में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है, जिसका सीधा असर इंसानी दिमाग पर पड़ता है। हालांकि इस बारे में अभी कुछ भी दावे से कह पाना संभव नहीं क्योंकि अलग-अलग साइंटिफिक स्टडी में अलग-अलग बातें निकलकर आई हैं। लेकिन इनमें ऐसी कोई रिसर्च नहीं है, जो इस बात को एविडेंस के आधार पर साबित कर पाए। लेकिन यह बात भी सच है कि प्राचीन ग्रंथों, पुराणों और कविताओं से लेकर वैलेंटाइन डे के कॉन्सेप्ट तक में बरसात से वसंत तक के मौसम को प्यार से जोड़कर देखा जाता रहा है। कुल मिलाकर बात यह है कि मौसम का असर सिर्फ चमड़ी तक सीमित नहीं है। जिस तरह स्किन को ठंडी या गर्मी का एहसास होता है, उसी तरह दिल और दिमाग भी मौसम का अनुभव करते और उसी के अनुसार रिएक्ट करते हैं। ऐसी स्थिति में कफिंग सीजन वाली बात भी सही लगती है। बस ध्यान इस बात का रखना है कि प्यार मौसम खत्म होने का बाद भी बना रहे क्योंकि प्यार का मौसम कभी खत्म नहीं होता।