आज (रविवार, 4 अगस्त) इंटरनेशनल फ्रेंडशिप डे है। अगस्त के पहले रविवार को फ्रेंडशिप डे मनाते हैं। मित्रता का ही एक मात्रा ऐसा रिश्ता है, जिसे व्यक्ति अपनी पसंद-नापसंद से चुनता है। हमें किससे दोस्ती करनी है और किससे नहीं, ये हम ही तय करते हैं। शास्त्रों में भी कई ऐसे मित्र बताए गए हैं, जिनसे हम सीख सकते हैं कि मित्रता में क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, जानिए कुछ खास पौराणिक मित्रों के किस्से और उनकी सीख… दुर्योधन और कर्ण महाभारत में दुर्योधन और कर्ण की मित्रता बहुत चर्चित है। दुर्योधन ने कर्ण को अपना प्रिय मित्र माना और उसे हर जगह मान-सम्मान दिलवाया। बदले में कर्ण ने दुर्योधन का हर कदम साथ दिया। कर्ण ने अपनी मित्रता में एक गलती की, उसने कभी भी दुर्योधन को अधर्म करने से नहीं रोका। इसी गलती की वजह से दुर्योधन का पूरा वंश ही खत्म हो गया। सीख- सच्चा मित्र वही है तो गलत काम करने से रोकता है। अगर दोस्ती में ये बात ध्यान नहीं रखी जाती है तो बर्बादी तय है। कर्ण धर्म-अधर्म जानता था, लेकिन उसने दुर्योधन को रोका नहीं, इस वजह से पूरा कौरव वंश ही खत्म हो गया। दोस्त के गलत कामों में साथ न दें, उन्हें ऐसा करने से रोकें। श्रीकृष्ण और सुदामा जब मित्रता की बात आती है तो श्रीकृष्ण और सुदामा को जरूर याद किया जाता है। श्रीकृष्ण और सुदामा बालसखा थे। इन दोनों ने महर्षि सांदीपनि के आश्रम में एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। यहीं इन दोनों के बीच मित्रता हुई। शिक्षा के बाद दोनों अलग-अलग हो गए और अपने-अपने जीवन में व्यस्त हो गए। श्रीकृष्ण द्वारिकाधीश थे और सुदामा बहुत ही गरीब। एक प्रसंग के अनुसार जब सुदामा अपने प्रिय मित्र श्रीकृष्ण से मिलने द्वारिका पहुंचे तो श्रीकृष्ण ने स्वयं सुदामा का सत्कार किया और मित्र के जीवन की सारी परेशानियां खत्म कर दीं। सीख – इनकी मित्रता की सीख यह है कि दोस्ती में अमीरी-गरीबी को महत्व नहीं देना चाहिए। मित्रता में समानता का भाव होना चाहिए और एक-दूसरे की मदद के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। श्रीराम और सुग्रीव रामायण में हनुमानजी ने श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता करवाई थी। श्रीराम ने सुग्रीव को वचन दिया था कि वे बाली से उसका राज्य और पत्नी वापस दिलवाएंगे। सुग्रीव ने सीता की खोज में सहयोग करने का वचन दिया था। बाली को मारकर श्रीराम ने अपना वचन पूरा कर दिया था और सुग्रीव को राजा बना दिया। राजा बनते ही सुग्रीव अपना वचन भूल गया, तब लक्ष्मण ने क्रोध किया। इसके बाद सुग्रीव को अपनी गलती का अहसास हुआ और सीता की खोज शुरू हुई। सीख – श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता से ये सीख मिलती है कि हमें मित्रता में कभी भी अपने वचन को नहीं भूलना चाहिए। मित्र की परेशानियां दूर करने की कोशिश करनी चाहिए। श्रीकृष्ण और द्रौपदी महाभारत में श्रीकृष्ण और द्रौपदी के बीच मित्रता का रिश्ता था। श्रीकृष्ण द्रौपदी को सखी कहते थे। द्रौपदी के पिता महाराज द्रुपद चाहते थे कि उनकी पुत्री का विवाह श्रीकृष्ण से हो, लेकिन श्रीकृष्ण ने द्रौपदी का विवाह अर्जुन से करवाया। श्रीकृष्ण ने हर मुश्किल परिस्थिति में द्रौपदी की मदद की। जब श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया तो चक्र की वजह से उनकी उंगली में चोट लग गई और रक्त बहने लगा। तब द्रौपदी ने अपने वस्त्रों से एक कपड़ा फाड़कर श्रीकृष्ण की उंगली पर बांधा था। बाद में जब भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण हुआ, तब श्रीकृष्ण ने उंगली पर बांधे उस कपड़े के एक-एक धागे का ऋण उतारा और द्रौपदी की लाज बचाई। इसके बाद भी श्रीकृष्ण ने हर कदम द्रौपदी को परेशानियों से बचाया। सीख – श्रीकृष्ण ने संदेश दिया है कि मित्र के छोटे से उपकार भी नहीं भूलना चाहिए और मित्र की परेशानियों में हर कदम उसका साथ देना चाहिए।