भारतीय रेसलर विनेश फोगाट मेडल के इतने करीब होकर भी पेरिस ओलिंपिक से बाहर हो गईं। कारण रहा 50 kg तय कैटेगरी से ज्यादा वजन होना। फाइनल मैच वाले दिन विनेश का वजन करीब 100 ग्राम ज्यादा मिला। इसके बाद उन्हें ओलिंपिक महिला कुश्ती से अयोग्य घोषित कर दिया गया। उसके बाद विनेश ने कुश्ती से संन्यास ले लिया। यहां तक का सफर विनेश के लिए किसी चट्टान तोड़ने से कम नहीं था। उन्होंने कई मुश्किलों का सामना किया। वे महिला पहलवानों के यौन शोषण के विरोध में लड़ीं। प्रदर्शन करने पर विनेश को दिल्ली की सड़कों पर घसीटा गया। इस विरोध में जंतर-मंतर पर धरने के दौरान काफी टाइम तक विनेश कुश्ती की प्रैक्टिस भी नहीं कर पाईं। 2020 में विनेश फोगाट को टोक्यो ओलिंपिक में हार के बाद ‘खोटा सिक्का’ और ‘लंगड़ा घोड़ा’ तक कहा गया। फेडरेशन अध्यक्ष के इन शब्दों ने विनेश को तोड़ दिया। विनेश के भाई हरविंदर बताते हैं कि विनेश इसके बाद डिप्रेशन में चली गईं थीं। डिप्रेशन से उबरने के लिए जब वह डॉक्टर के पास गईं, तब पता चला कि 2018 में प्रैक्टिस के दौरान उनके सिर पर गहरी चोट लगी थी। ज्यादा टेंशन लेने के कारण विनेश की चोट उभर आई। इस सदमे और चोट से उबरने में विनेश को 9 महीने लगे। जिन मुश्किलों से विनेश गुजरी हैं, कुछ वैसी ही मुश्किलों और चुनौतियों से हम में से कई लोग गुजर रहे होंगे। जो जीवन में कई बार असफल हुए हों, जिन्होंने हर मुकाम में मुश्किलें झेली हों या फिर कई और चुनौतियों का सामना कर किया हो। तो आज ‘रिलेशनशिप’ कॉलम में इसी विषय पर बात करेंगे। मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी ने दैनिक भास्कर से इस बारे में बात की और बताया कि जब आपके सामने मुश्किल परिस्थितियां आएं तो उनसे कैसे डील करें। शोध से पता चलता है कि असफलता का अहसास मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव डाल सकता है। बार-बार मिल रही असफलता का किसी व्यक्ति के मेंटल और इमोशनल वेलबीइंग पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। असफलता और मुश्किल परिस्थितियों का असर उम्र के मुताबिक अलग होता है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ नोवल रिसर्च एंड डेवेलपमेंट (IJNRD) की एक स्टडी कहती है कि आटिकिफोबिया (असफलता का डर) बच्चों में तब होता है, जब वे हार के दौरान चिंता और डर का अनुभव करते हैं। वहीं एडल्ट्स में असफलता का ये डर क्रॉनिक तनाव का रूप भी ले सकता है। इसका परिणाम कई नकारात्मक प्रभावों के तौर पर देखने को मिल सकता है। मुश्किल परिस्थितियों और असफलताओं से कैसे सीखें जब आप अपने सपनों का पीछा करते हैं तो आपके असफल होने की संभावना भी उतनी ही हो सकती है, जितनी कि सफल होने की। कहा जाता है कि असफलता लोगों को नहीं रोकती, बल्कि लोग असफलता से जिस तरह से डील करते हैं, वही उन्हें आगे बढ़ने से रोकता है। इसलिए ऐसे वक्त में आप- ‘साइकोलॉजिकल फर्स्ट ऐड’ का सहारा लें असफलता निराश करती है और इंसान के दिल और दिमाग पर गहरा असर डाल सकती है। 20 से 30 की उम्र में असफलताओं का सामना करना ज्यादा मुश्किल हो सकता है क्योंकि यह पहली बार है, जब हम बड़ी विफलताओं का अनुभव कर रहे होते हैं। विश्वविद्यालय में अच्छा प्रदर्शन न कर पाना, नौकरी छूट जाना, कॉम्पिटिशन में हार जाना या फिर कोई कॉम्पिटिटिव एग्जाम कई बार देने के बाद भी क्लियर नहीं कर पाना। ऐसे में मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी यह सलाह देते हैं कि आपको ‘साइकोलॉजिकल फर्स्ट ऐड’ का सहारा लेने चाहिए। यानी किसी अपने और करीबी से जाकर बात करें। अपना दर्द बांटें इससे भी आपको उस मुश्किल वक्त से बाहर निकलने में मदद मिलेगी। साइकोलॉजिकल फर्स्ट एड का काम होता है मानसिक तौर पर प्राथमिक उपचार देना। सरल शब्दों में कहें तो किसी ऐसे इंसान को इमोशनल सपोर्ट देना, जो चिंता या दुख में हो। जब हम दुखी होते हैं उस समय हमें किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत पड़ती है, जो हमें संभाल सके, जिसकी बातें सुनकर दिमाग शांत हो जाए। इसके लिए कोई डिग्री नहीं चाहिए होती, कोई भी किसी भी मददगार व्यक्ति को साइकोलॉजिकल फर्स्ट एड दे सकता है। साइकोलॉजिकल फर्स्ट एड देने वाले को-