केंद्र सरकार ने महाराष्ट्र में आरक्षण विरोधी प्रदर्शनों को देखते हुए NCP (SP) प्रमुख शरद पवार की सुरक्षा में इजाफा किया है। केंद्र ने उन्हें Z+ सिक्योरिटी दी है। पवार को पहले से ही राज्य सरकार की Z+ सुरक्षा मिली हुई है। केंद्र के फैसले के बाद दस अतिरिक्त CRPF जवान उनकी सुरक्षा में तैनात किए जाएंगे। राज्य में आरक्षण संबंधी प्रदर्शनों के अलावा कई अन्य मुद्दों को लेकर बने हालात को देखते हुए खुफिया एजेंसियों ने उनकी सुरक्षा को लेकर अलर्ट जारी किया था। इसके बाद उनकी सुरक्षा बढ़ाई गई है। SC आरक्षण में कोटा लागू करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ प्रदर्शन जारी
सुप्रीम कोर्ट के SC आरक्षण में कोटा लागू करने की इजाजत देने के खिलाफ बुधवार को दलित-आदिवासी संगठनों ने 14 घंटे का भारत बंद बुलाया। नेशनल कन्फेडरेशन ऑफ दलित एंड आदिवासी ऑर्गनाइजेशन (NACDAOR) ने इसे दलित और आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ बताया है। सुप्रीम कोर्ट ने 1 अगस्त को इस बारे में बड़ा फैसला सुनाया था। राज्य सरकारें अब अनुसूचित जाति, यानी SC के रिजर्वेशन में कोटे में कोटा दे सकेंगी। अदालत ने 20 साल पुराना अपना ही फैसला पलटा था। तब कोर्ट ने कहा था कि अनुसूचित जातियां खुद में एक समूह हैं, इसमें शामिल जातियों के आधार पर और बंटवारा नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने अपने नए फैसले में राज्यों के लिए जरूरी हिदायत भी दी थी। कहा था कि राज्य सरकारें मनमर्जी से फैसला नहीं कर सकतीं। फैसला सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की संविधान पीठ का था। इसमें कहा गया कि अनुसूचित जाति को उसमें शामिल जातियों के आधार पर बांटना संविधान के अनुच्छेद-341 के खिलाफ नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के SC आरक्षण में कोटा लागू करने की इजाजत देने के खिलाफ बुधवार को दलित-आदिवासी संगठनों ने 14 घंटे का भारत बंद बुलाया। नेशनल कन्फेडरेशन ऑफ दलित एंड आदिवासी ऑर्गनाइजेशन (NACDAOR) ने इसे दलित और आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ बताया है। सुप्रीम कोर्ट ने 1 अगस्त को इस बारे में बड़ा फैसला सुनाया था। राज्य सरकारें अब अनुसूचित जाति, यानी SC के रिजर्वेशन में कोटे में कोटा दे सकेंगी। अदालत ने 20 साल पुराना अपना ही फैसला पलटा था। तब कोर्ट ने कहा था कि अनुसूचित जातियां खुद में एक समूह हैं, इसमें शामिल जातियों के आधार पर और बंटवारा नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने अपने नए फैसले में राज्यों के लिए जरूरी हिदायत भी दी थी। कहा था कि राज्य सरकारें मनमर्जी से फैसला नहीं कर सकतीं। फैसला सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की संविधान पीठ का था। इसमें कहा गया कि अनुसूचित जाति को उसमें शामिल जातियों के आधार पर बांटना संविधान के अनुच्छेद-341 के खिलाफ नहीं है।