क्या पश्चिमी देशों के दबाव में यूक्रेन जा रहे मोदी:सिर्फ 7 घंटे के लिए पुतिन के दुश्मन से मिलने से क्या हासिल होगा

“दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नेता (मोदी) का दुनिया के सबसे खूनी अपराधी (पुतिन) को गले लगाना दिल तोड़ने वाला है।” 9 जुलाई को जब मोदी रूस के दौरे पर पहुंचे तो ये बात यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने कही थी। इसके ठीक 44 दिन बाद मोदी यूक्रेन के दौरे पर हैं। वे यूक्रेन जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं। मोदी 7 घंटे यूक्रेन की राजधानी कीव में रहेंगे। फरवरी 2022 में जंग शुरू होने के बाद यूक्रेन जाने वाले नेताओं की तादाद गिनी-चुनी है। सिर्फ उन पश्चिमी देशों के नेता कीव गए हैं जो जंग में रूस के खिलाफ हैं। वहीं, भारत ने जंग खत्म करने की हिमायत जरूर की है, लेकिन कभी रूस की खिलाफ कोई स्टैंड नहीं लिया है। ऐसे में मोदी का यूक्रेन दौरा हैरान करने वाला है। भारत और यूक्रेन के बीच मात्र 3 बिलियन डॉलर का व्यापार होता है। जबकि भारत-रूस का ट्रेड 60 बिलियन डॉलर से भी ज्यादा है। भारत अपने ज्यादातर हथियार और तेल रूस से खरीदता है, जबकि यूक्रेन और भारत के बीच रक्षा सहयोग न के बराबर है। फिर मोदी यूक्रेन के दौरे पर क्यों हैं, इससे दोनों देशों के रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा, क्या भारत पर पश्चिमी देशों का दबाव है, इस स्टोरी में जानिए मोदी के यूक्रेन दौरे से जुड़े 5 अहम सवालों के जवाब… सवाल 1: मोदी यूक्रेन क्यों गए हैं?
जवाब: पीएम मोदी के यूक्रेन जाने के पीछे 3 वजह हो सकती हैं। पहली- एक्ट ऑफ बैलेंसिंग: जंग के बीच पीएम मोदी के रूस जाने के बाद उनकी आलोचना हो रही थी। पश्चिमी देशों ने रूस दौरे पर नाराजगी जताते हुए भारत पर आरोप लगाए थे कि वह एकतरफा स्टैंड ले रहा है। भारत में विकास से जुड़े मामलों से लेकर सुरक्षा समझौतों तक में पश्चिमी देशों का बड़ा प्रभाव है। यही वजह है कि पीएम मोदी इस यात्रा के तहत दोनों धड़ों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश में यूक्रेन जा रहे हैं। दूसरी- ब्रिज रोल प्लेः रूस-यूक्रेन युद्ध को न तो अमेरिका रोकना चाहता है और न ही रूस की इसे खत्म करने में कोई दिलचस्पी है। मोदी जब रूस गए थे तो उन्होंने वहां शांति की बातें की थीं। यूक्रेन जाकर भी मोदी यही बात कहेंगे। भारत सिर्फ खुद को रिप्रेजेंट नहीं करता बल्कि ग्लोबल साउथ के देशों का भी नेतृत्व करता है। ऐसे में मोदी यूक्रेन जाकर ग्लोबल साउथ देशों का पक्ष रखेंगे। भारत 2 गुटों में बंटी दुनिया के बीच ब्रिज यानी एक पुल का काम कर सकता है। तीसरी- द्विपक्षीय वार्ता: भारत और यूक्रेन के बीच बीते 25 सालों में व्यापारिक संबंधों में इजाफा देखने को मिला है। इसके अलावा भारत किस तरह युद्ध के बाद यूक्रेन की मदद कर सकता है, इस पर भी बात हो सकती है। जैसे कि दवाएं, अस्पताल सुविधाएं, या फिर बुनियादी ढांचे को बेहतर करने में भारत किस तरह यूक्रेन की मदद कर सकता है, जिससे रूस नाराज न हो। सवाल 2: क्या मोदी पश्चिमी देशों के दबाव में यूक्रेन गए?
जवाब: यूक्रेन की स्थापना के 33 साल होने के बाद कोई प्रधानमंत्री वहां जा रहा है। इससे तो ये जाहिर है कि अगर यूक्रेन इतना ही महत्वपूर्ण देश था तो पहले ही किसी पीएम को वहां जाना चाहिए था।अब मोदी यूक्रेन जा रहे हैं तो ये साफ है कि वे सामान्य दौरे पर नहीं जा रहे। जाहिर है कि उनके इस दौरे के पीछे पश्चिमी देशों का दबाव हो। सवाल 3: पीएम मोदी की इस यात्रा का भारत-रूस के रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा?
जवाब: मोदी के यूक्रेन दौरे को लेकर रूस का बयान शायद ही आए। हालांकि रूस सरकार इससे निराश जरूर होगी।
रूस ऐसी स्थिति में फंसा है कि वह तुरंत इस पर प्रतिक्रिया नहीं देगा, लेकिन रूस बदले में भारत के दुश्मन चीन और पाकिस्तान के साथ संबंधों को और बेहतर बनाने की कोशिश करता दिख सकता है। सवाल 4: पीएम मोदी की यूक्रेन यात्रा से भारत को क्या फायदा होगा?
जवाब: ​​​​​भारत दुनिया को इस यात्रा के जरिए ये दिखाने की कोशिश कर सकता है कि वह एक ग्लोबल पावर है। भारत अगर अमेरिका के करीब है तो वह रूस के भी उतना ही करीब है। भारत किसी के भी दबाव में नहीं आएगा। हालांकि अभी तक भारतीय अधिकारियों ने मोदी के यूक्रेन दौरे को लेकर जो बातें कही हैं उसमें ये संदेश दिख नहीं रहा। सवाल 5: क्या इस यात्रा से यूक्रेन को फायदा होने वाला है?
जवाब: पीएम मोदी की इस यात्रा से यूक्रेन को होने वाला फायदा भारत से ज्यादा है। भारत ग्लोबल साउथ के सबसे प्रमुख और बड़े देशों में से है। चीन का कोई भी प्रतिनिधि जंग की शुरुआत के बाद से यूक्रेन नहीं गया है। ऐसे में अगर ग्लोबल साउथ के किसी बड़े देश का नेता यूक्रेन की यात्रा कर रहा है, तो ये उसके लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है। ऐसे में यूक्रेन भारत को अपने समर्थन में दिखाने की कोशिश भी कर सकता है। साथ ही वो भारत के इस कदम के जरिए रूस को नाराज करने की कोशिश भी करेगा। इन सभी सवालों के जवाब जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में विदेश मामलों के जानकार राजन कुमार ने दिए हैं।