माता ने विकराल रूप धर किया था रक्तबीज का संहार:देवताओं ने आसन दिया, कहलाईं विजयासन देवी; 450 साल पहले बंजारों ने बनवाया था मंदिर

देवीधाम सलकनपुर के लिए श्रद्धालु जत्थों में आगे बढ़े चले जा रहे हैं। औबेदुल्लागंज से सलकनपुर तक के रास्ते में जगह-जगह भंडारे हैं। 50-100 किलोमीटर दूर से पैदल आ रहे भक्त यहां प्रसादी ग्रहण कर थोड़ा सुस्ताते हैं, इसके बाद दोगुने जोश से मां का जयकारा लगाते हुए आगे बढ़ जाते हैं। शारदीय नवरात्रि आज से प्रारंभ हाे गई है। दैनिक भास्कर इन 9 दिनों में आपको प्रदेश के 9 देवी मंदिरों के दर्शन करवा रहा है। पहले दिन राजधानी भोपाल से 80 किमी दूर सलकनपुर स्थित मां विजयासन के दर्शन कीजिए… मध्‍यप्रदेश के सीहोर जिले में विंध्‍याचल की मनोरम वादियों में स्थित है देवीधाम सलकनपुर। चारों ओर हरियाली से भरपूर पर्वतों में से एक पर है मां विंध्‍यवासिनी का भव्य मंदिर। नवरात्रि पर माता के दर पर माथा टेकने देश-विदेश से भक्त आ रहे हैं। लोग 1401 सीढ़ी चढ़कर 800 फीट ऊंचे पर्वत पर विराजित मां के दर्शन करने पहुंच रहे हैं। कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण 450 साल पहले बंजारों ने करवाया था। यहां मां ने किया था रक्तबीज का संहार मंदिर के पुजारी प्रभुदयाल महंत ने बताया, ‘श्रीमद् भागवत में उल्लेख है कि दैत्य रक्तबीज से त्रस्त होकर देवता माता की शरण में पहुंचे। देवी ने विकराल रूप धारण कर इसी स्थान पर रक्तबीज का संहार किया। मां भगवती की इस विजय पर देवताओं ने उनकी स्तुति की। उन्हें जो आसन दिया, वही विजयासन धाम के नाम से विख्यात हुआ। यही रूप विजयासन देवी कहलाया। कई लोग इन्हें कुलदेवी के रूप में भी पूजते हैं।’ सीढ़ियों पर तीन विश्राम स्थल पहाड़ी पर मंदिर के ऊपर और नीचे मेडिकल टीमें तैनात हैं। सीढ़ियों से मंदिर तक पहुंचने के लिए ट्रस्ट ने पानी से लेकर छांव तक की व्यवस्था कर रखी है। 500 सीढ़ियां चढ़ने पर पहला विश्राम स्थल है। इसके आगे आप 300 सीढ़ियां और चढ़ेंगे तो दूसरा 800वीं सीढ़ी पर, 300 सीढ़ियां और चढ़ेंगे तो तीसरा विश्राम स्थल 1100वीं सीढ़ी पर आएगा। निजी वाहनों पर प्रतिबंध नवरात्रि को देखते हुए प्रशासन और ट्रस्ट ने पहाड़ी से सटकर 2000 से ज्यादा चारपहिया वाहनों की एक साथ पार्किंग की व्यवस्था की है। पहाड़ी पर भी पार्किंग की व्यवस्था है। नवरात्रि पर निजी वाहनों के चोटी तक जाने की मनाही है। ट्रस्ट द्वारा संचालित वाहन से भक्त आना-जाना कर सकते हैं। वे अपने वाहन नीचे पार्किंग में खड़ा कर जा सकते हैं। धर्मशाला के पास रोप-वे से भी आना-जाना कर सकते हैं। रोप-वे से 5 मिनट में मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। वाहन से 15 मिनट में मंदिर तक का सफर पूरा होता है। नवरात्रि पर सुबह 4 बजे से रात 12 बजे तक रोप-वे चलता है। दो ट्रॉली में एक बार में 12 लोग जाते हैं। सामान्य दिनों में सुबह 9 बजे से 5.30 बजे तक रोप-वे चलता है। नवरात्रि में 24 घंटे खुले रहेंगे मंदिर के पट मंदिर का क्षेत्र 30 एकड़ में फैला, 25 एकड़ में बन रहा देवी लोक विजयासन मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष महेश उपाध्याय ने बताया, ‘मंदिर का पूरा क्षेत्र करीब 30 एकड़ में फैला है। 5 एकड़ में माता मंदिर का परिसर है। बाकी के 25 एकड़ में देवी लोक का निर्माण कार्य चल रहा है। करीब एक साल में यह पूरा हो जाएगा। मंदिर का भी रेनोवेशन चल रहा है। मंदिर का निर्माण धौलपुर पत्थर से हो रहा है। पत्थरों की नक्काशी सिकंदरा में हो रही है। सुरक्षा व्यवस्था पुलिस-प्रशासन देखता है। ट्रस्ट भक्तों के लिए छाया-पानी के साथ ही सुगम दर्शन हों, इस व्यवस्था को देखता है। संस्कृति विभाग गायन और कवि सम्मेलन का आयोजन करता है। 9 दिन के मेले के साथ ही लोग भंडारे का आयोजन करते हैं। बंजारों ने कराया था मंदिर का निर्माण; जानिए, इसके पीछे का किस्सा मंदिर निर्माण कब हुआ, इसे लेकर कुछ भी स्पष्ट नहीं है। मान्यता है कि मंदिर का निर्माण बंजारों ने करवाया था। 450 साल पहले पशुओं का व्यापार करने वाले बंजारे यहां से गुजर रहे थे। थकान होने पर वे विश्राम के लिए यहां कुछ समय रुके। उन्होंने अपने पशुओं को पास में ही बांध दिया। उनकी नींद लग गई। जब आंख खुली तो पशु अदृश्य हो गए थे। बंजारे जब जंगल में पशुओं को खोज रहे थे, तब बुजुर्ग बंजारे को एक बच्ची मिली। बच्ची ने बुजुर्ग से उसके जंगल में भटकने का कारण पूछा। बुजुर्ग ने पूरी घटना बता दी। बालिका ने कहा- आप यहां देवी के स्थान पर जाकर पूजा-अर्चना करेंगे तो मनोकामना पूर्ण हो सकती है। बंजारे ने कहा कि उन्हें नहीं पता कि मां भगवती का स्थान कहां है? बालिका ने एक पत्थर फेंका। जहां पत्थर गिरा, वहां बुजुर्ग पहुंचा तो मां भगवती के दर्शन हुए। बंजारों ने पूजा-अर्चना की। कुछ ही क्षण बाद उनके पशु मिल गए। मन्नत पूरी होने पर बंजारों ने कुछ समय यहां रुककर मंदिर का निर्माण करवाया। बंजारों ने जब इसका जिक्र आस-पड़ोस के गांवों में किया तो भक्त माता के दर्शन के लिए घने जंगल में आना शुरू हो गए। वे यहां आकर माता के सामने मुरादें मांगने लगे। स्वामी भद्रानंद ने किया धूना चैतन्य पुजारी प्रभुदयाल ने बताया कि हिंसक जानवरों, चौसठ योग-योगिनियों का स्थान होने से कुछ लोग यहां आने में संकोच करते थे। राजा विक्रमादित्य के वंशज राजा सुधन्वा माता के परम भक्त थे। उन्होंने नर्मदा नदी के उत्तर तट पर भगवती की विशेष अर्चना की। कुछ समय बाद यहां स्वामी भद्रानंद जी आए। उन्होंने यहां तपस्या कर चौसठ योग-योगिनियों के लिए एक स्थान स्थापित किया। मंदिर के समीप ही एक धूने की स्थापना की। इस स्थान को चैतन्य किया। धूने में अभिमंत्रित चिमटा तंत्र शक्ति से अभिमंत्रित कर तली में स्थापित किया गया है। इसकी भभूत ही मुख्य प्रसाद के रूप में श्रद्धालु ग्रहण करते हैं। मंदिर में विराजित माता प्रतिमा स्वयंभू मंदिर का कई बार जीर्णोद्धार किया गया। यहां कई साल से अखंड धूनी और अखंड ज्योति प्रज्ज्वलित है। गर्भगृह में देवी की प्रतिमा स्‍वयंभू है। माता को मुकुट और चांदी के नेत्र से सजाया गया है। मंदिर के गर्भगृह में स्वयंभू पीठ (मां भगवती का स्थान) है। उनके साथ मां सरस्वती, मां महालक्ष्मी और बाल गणेश भी यहां विद्यमान हैं। तीनों प्रतिमाएं संगमरमर की हैं। ऐसा कहा जाता है कि गिन्‍नौर से एक साधु ने इन्‍हें यहां लाकर विराजित किया था। द्वार के ऊपर मां के सेवक लांगुरवीर अर्थात हनुमानजी की मूर्ति स्‍थापित है। ठीक सामने भैरव बाबा की मूर्ति है। गर्भगृह में 400 साल से भी अधिक समय से 2 अखंड ज्‍योति प्रज्ज्वलित हैं। एक नारियल के तेल और दूसरी घी की। दोनों ज्योति को लेकर मान्यता है कि ये सूर्य और चंद्रमा की तरह अटल हैं। भक्‍त ज्‍योति की पूजा करते हैं। मंदिर के बाहर खोखली माता का प्राचीन मंदिर है। ऐसी मान्यता है कि खोखली माता के सामने परिजन बच्‍चों को लेकर शीश झुकाकर प्रार्थना करते हैं। खोखली माता प्रसन्‍न होती हैं और बच्‍चों की खांसी ठीक हो जाती है। मनोकामना पूरी होने पर तुलादान पुजारी के अनुसार, मंदिर में भक्त अपनी मनोकामना लेकर आते हैं। वे यहां पहले उल्टा हाथ लगाते हैं। कामनापूर्ति पर सीधा हाथ लगाने आते हैं। बच्चों का मुंडन संस्कार के साथ ही तुलादान संस्कार भी यहां होता है। मनोकामनापूर्ति पर कई भक्त तुलादान कराते हैं। भक्‍त यहां अपनी क्षमता अनुसार अनाज, फल, गुड़, सोना-चांदी समेत अन्य वस्तुओं से तुलादान कराकर उसे मंदिर को दान करते हैं। मंदिर में आने वाले भक्‍त मां के दर्शन के बाद अपनी इच्‍छाओं को पवित्र धागे में अभिमंत्रित कर बांह या गले में बांधते हैं। मन्नत पूरी होने के बाद वापस आकर मंदिर में धागे को खोलकर यहीं छोड़ देते हैं। 2003 में बनी मंदिर तक पहुंचने के लिए सड़क 1966 से मंदिर की व्‍यवस्‍था ट्रस्ट की देखरेख में है। 2003 में मंदिर ट्रस्‍ट ने वाहनों के मंदिर के पास तक पहुंचने के लिए मार्ग का निर्माण शुरू करवाया। पहाड़ी को काटकर चोटी तक सड़क निर्माण हुआ। इस मार्ग की मदद से अब भक्त ऊपर तक पहुंचते हैं। मध्यप्रदेश के 9 देवी मंदिरों के दर्शन के क्रम में कल पढ़िए, देवास के माता मंदिर के बारे में, यहां की मान्यता, विशेषता और शारदीय नवरात्रि पर क्या है खास…