‘कमाई बहुत कम है और घर के खर्चे ज्यादा। सरकार की तरफ से अकाउंट में हर महीने एक हजार रुपए आते हैं। इनसे बड़ी मदद मिल जाती है। बच्चे पर खर्च करती हूं। उसकी फीस निकल जाती है। मेरे लिए तो यही बहुत है।’ प्रियंका भट्टाचार्य कोलकाता में रहती हैं। घर में 5 लोग हैं। परिवार महीने में 20 हजार रुपए कमाता है। प्रियंका उन दो करोड़ महिलाओं में शामिल हैं, जिनके अकाउंट में पश्चिम बंगाल की ममता सरकार हर महीने एक हजार रुपए भेजती है। ये योजना महिलाओं में पॉपुलर है, इसका फायदा ममता बनर्जी की पार्टी TMC को चुनाव में मिलता है। कभी ऐसा होता था कि महिलाएं अपनी मर्जी से वोट नहीं दे पाती थीं, अब वे सरकारें बनवा रही हैं। हाल में दिल्ली, महाराष्ट्र और झारखंड के विधानसभा चुनाव में यही हुआ। तीनों राज्यों में एक बात कॉमन थी, महिलाओं के खाते में पैसे ट्रांसफर करने वाली योजनाएं गेमचेंजर मानी गईं। इससे पहले मध्यप्रदेश में BJP को लाडली बहना और कर्नाटक में कांग्रेस को गृह लक्ष्मी योजना का फायदा मिला। महिला दिवस पर दैनिक भास्कर ने दिल्ली और पश्चिम बंगाल की उन महिलाओं से बात की, जिन्हें ऐसी योजनाओं का फायदा मिल रहा है। दोनों राज्यों में महिला मुख्यमंत्री हैं। हमने पूछा कि योजनाओं से जिंदगी कितनी बदली और क्या इसका असर वोटिंग के पैटर्न पर भी हुआ है। पश्चिम बंगाल में ममता सरकार ने 2021 में लक्ष्मी भंडार योजना शुरू की थी। वहीं, दिल्ली में इस महिला दिवस पर महिलाओं को 2500 रुपए महीना देने की योजना शुरू की जा रही है। BJP ने विधानसभा चुनाव से पहले संकल्प पत्र में इसका वादा किया था। CM रेखा गुप्ता आज यानी 8 मार्च को पहली किस्त जारी कर सकती हैं। महिलाओं की बात… किरदार- दीपाली, दिल्ली
फ्री बस से हर महीने 2-3 हजार रुपए बचे, इनसे किताबें खरीदती हूं
दीपाली दिल्ली के सीमापुरी में रहती हैं। अक्सर बस में सफर करती हैं। दीपाली कहती हैं, ‘फ्री बस की स्कीम ऐसी है, जिसके लिए कोई फार्म नहीं भरना पड़ता। सीधा फायदा मिलता है। मैं सीमा डिपो से बस लेती हूं। ऑफिस के लिए लाजपतनगर जाती हूं। पहले मेरे हर महीने 2-3 हजार रुपए खर्च हो जाते थे। अब ये बच जाते हैं। मुझे किताबों और म्यूजिक का शौक है। आने-जाने का पैसा बच रहा है, तो उसे किताबों पर खर्च करती हूं।’ किरदार- ऊषा देवी, दिल्ली ‘पैसा हाथ में आए, तो परिवार की मदद हो जाएगी’
45 साल की ऊषा देवी दिल्ली के शालीमार बाग इलाके में रहती हैं। उनका परिवार UP के इटावा में रहता था, फिर दिल्ली में बस गया। घर में पति, बेटा और बेटी हैं। दिल्ली में महिलाओं के लिए फ्री इलाज और बस के सफर जैसी योजनाएं हैं, लेकिन ऊषा कहती हैं कि इसका बहुत फायदा नहीं है। उन्हें सरकार की तरफ से मिलने वाले 2500 रुपए का इंतजार है। ऊषा बताती हैं, ‘मैं एक स्कूल में काम करती थी। लॉकडाउन के बाद काम छूट गया। पति बीमार हैं, इसलिए घर पर रहती हूं। चार-पांच साल पहले पति का ऑपरेशन हुआ था। वे सिलाई करते थे। ऑपरेशन के बाद काम नहीं कर पाते। दोनों बच्चे एक फैक्ट्री में काम करते हैं। एक को 8 हजार रुपए और दूसरे को 7 हजार रुपए मिलते हैं।’ ‘बेटी भी बीमार रहती है। उसके हाथ और पैरों में सूजन रहती है। 6-7 महीने से वो काम पर नहीं जा पाती। अंबेडकर अस्पताल से उसका इलाज चल रहा है। इलाज तो मुफ्त है, लेकिन दवा का खर्च उठाना पड़ता है। पति और बेटी की दवा पर हर महीने 5 हजार रुपए खर्च होते हैं। फ्री बस का क्या करें, बेटी इस हालत में नहीं है कि उसे बस से अस्पताल ले जाऊं।’ आप परिवार के कहने पर वोट देती हैं या अपनी मर्जी से? जवाब में ऊषा कहती हैं, ‘अपनी मर्जी से वोट डालती हूं। मुझे कोई नहीं बताता किसे वोट देना है। आम आदमी पार्टी की सरकार अच्छा काम कर रही थी। बिजली और पानी फ्री कर दिया था। इस बार BJP को वोट दिया है। दोनों पार्टियों ने अकाउंट में पैसे भेजने की बात कही थी। कैसे आएगा ये नहीं पता।’ किरदार- किरण, दिल्ली ‘सारे फैसले पति करते हैं, लेकिन वोट अपनी मर्जी से देती हूं’
35 साल की किरण सिलाई का काम करती हैं। सीलमपुरी में रहती हैं। पति बीमार रहते हैं, इसलिए घर की जिम्मेदारी किरण पर है। उनका परिवार बिहार के मुजफ्फरपुर से दिल्ली आया है। फ्री वाली योजनाओं पर किरण कहती हैं, ‘फ्री बस तो उनके लिए है, जो बाहर निकलती हैं। मैं घर से काम करती हूं। जो महिलाएं घर पर रहती हैं, सरकार को उन्हें काम देना चाहिए। हम काम करेंगे तो घर में कुछ पैसा आएगा। सरकार 2500 रुपए देने वाली है, इसमें क्या होगा। मेरे दो छोटे बेटे और दो बेटियां हैं। बीमारी की वजह से पति रोज काम पर नहीं जा पाते।’ हमने पूछा वोट डालते वक्त क्या सोचती हैं, क्या परिवार से कोई बताता है कि किसे वोट देना है? किरण कहती हैं, ‘घर के सारे फैसले पति करते हैं। वोट मैं अपनी मर्जी से देती हूं। कोई भी सरकार हो, मैं तो काम करूंगी ही।’ किरदार- पपिया चौधरी, पश्चिम बंगाल
चार साल से पैसे मिल रहे, बेटी की फीस भरती हैं
पपिया चौधरी कोलकाता में रहती हैं। घर में पपिया और उनकी एक बेटी है। पपिया हर महीने 10 हजार रुपए कमाती हैं। उन्हें लक्ष्मी भंडार योजना के एक हजार रुपए मिलते हैं। पपिया कहती हैं, ‘सरकार से मिलने वाले पैसों से बहुत मदद हो जाती है। पैसे मिलते हुए करीब 4 साल हो गए। मेरा खर्च मैं निकाल लेती हूं। कभी बेटी की ट्यूशन फीस देने में परेशानी होती है, तब ये पैसा काम आता है। सरकार अगर पैसा थोड़ा और बढ़ा दे तो अच्छा होगा।’ एक्सपर्ट बोले- महिलाओं को पैसे देने से बच्चों की पढ़ाई सुधरेगी
इंडियन स्कूल ऑफ डेमोक्रेसी के को-फाउंडर प्रखर भारती बताते हैं, ‘राजनीतिक मुद्दों का सीधा असर हाशिए पर रहने वाले समाज पर पड़ता है। उन्हें इससे फर्क पड़ता है कि सरकार किसकी बनी है। इसलिए महिलाओं के वोट ज्यादा होते हैं। महिलाओं में जागरूकता बढ़ी है। उन्हें समझ आने लगा है कि जो भी सत्ता में आएगा, उसका असर उनके निजी जीवन पर पड़ेगा।’ ‘इसकी शुरुआत बिहार में नीतीश कुमार के आने से हुई थी। फिर ओडिशा में नवीन पटनायक और बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार में इसका असर दिखा। अब पूरे देश में महिलाओं पर फोकस करते हुए पॉलिसी बनाई जा रही हैं। उन्हें वोट बैंक के तौर पर देखने की शुरुआत पिछले 10 साल से हुई है। महिलाएं संगठित हो रही हैं, इसलिए उनकी सुनी भी जा रही है।’ ‘महिलाओं को फ्री बस सर्विस मिल रही है। वर्कफोर्स में उनकी हिस्सेदारी 50% है। अगर उनके पास आने-जाने का साधन नहीं होगा तो वे काम पर नहीं जा पाएंगी। फैक्ट्री में काम करने वाली महिलाओं को 7 से 8 हजार रुपए महीना मिलता है। पहले 3-4 हजार रुपए तो आने-जाने पर खर्च हो जाते थे। अब ये पैसा बच रहा है।’ प्रखर आगे बताते हैं, ‘अगर किसी महिला के अकाउंट में 2500 रुपए आ रहे हैं, तो उनके बच्चे की पढ़ाई और परिवार की सेहत बेहतर होगी। इसका असर परिवार पर पड़ता है। यह साबित हो चुका है कि जब पैसा और सत्ता महिलाओं के हाथ में हो, तो उसका इस्तेमाल परिवार की भलाई में होता है। पुरुष नेता चुनकर आते हैं, तो उनका निवेश इन्फ्रास्ट्रक्चर पर ज्यादा होता है। महिलाएं परिवार, टॉयलेट, सफाई, स्कूल और अस्पताल के मुद्दों पर फोकस करती हैं।’ ‘महिलाओं के लिए 1500 रुपए के भी बहुत मायने’
वहीं, प्रो. विभूति पटेल कहती हैं, ‘महिलाएं अब खुद तय करती हैं कि उन्हें किसे वोट देना है। हमारी दादी की पीढ़ी से अब तक यह बदलाव तो आ गया है। इस पीढ़ी की लड़कियों में आजादी की भावना है। सरकार महिलाओं को सीरियसली लेने लगी है। राज्य सरकारें महिलाओं को 1000 से 2500 रुपए तक देती हैं। हम महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में जाते हैं। वहां की महिलाओं के लिए 1500 रुपए भी बहुत मायने रखते हैं। ‘ये वो इलाके हैं, जहां राशन नहीं पहुंच रहा है। चावल और गेहूं मिल रहा है, लेकिन दाल महंगी है। पैसे मिलने से महिलाओं की पर्चेजिंग पावर बढ़ी है। इससे इकोनॉमी को भी फायदा हुआ है।’ ‘महिलाओं को पैसे मिलेंगे, तो वो पहले बेटी की फीस भरेंगी’
प्रगतिशील महिला संगठन की महासचिव पूनम कौशिक बताती हैं, ‘सरकार को भी महिलाओं की ताकत पता है। 2016 में सरकार ने PF से जुड़े नियम बदलने की कोशिश की थी। तब बेंगलुरु में महिलाएं मार्च करने निकल आई थीं। दो दिन वे सड़कों पर रहीं, तीसरे दिन सरकार को फैसला वापस लेना पड़ा।’ पॉलिटिकल पार्टियां क्या कहती हैं… BJP: वक्त बदल गया, अब फैमिली महिलाओं के कहने पर वोट देती है
दिल्ली में BJP की महिला मोर्चा अध्यक्ष ऋचा पांडे बताती हैं, ‘महिलाओं के वोट बढ़ रहे हैं। इसका एहसास हमें 2019 के चुनाव के बाद ही हो गया था। हमने महिलाओं को जोड़ा। पॉलिटिक्स में उनकी हिस्सेदारी बढ़ाई। हर बूथ पर हमारी महिला प्रहरी रहती हैं, जो वोटिंग वाले दिन महिलाओं को वोट देने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। अपने इलाके में 500 से 600 महिलाओं को सरकार की योजनाओं से जोड़ती हैं।’ ऋचा पांडे आगे कहती हैं, ‘महिलाओं की आर्थिक स्थिति बेहतर हो रही है। इसलिए समाज में उनका दर्जा बढ़ा है। अगर हम महिलाओं को समझा दें, तो पूरा परिवार एक ही पार्टी को वोट देगा। परिवार का वोट बिखरता है, तो इसका नुकसान होता है।’ TMC: डायरेक्ट कैश स्कीम से महिलाएं मजबूत हुईं
पश्चिम बंगाल सरकार में मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य बताती हैं, ‘हमारी मुख्यमंत्री समझती हैं कि देशभर में महिलाएं समान भागीदारी और अधिकारों के लिए लड़ रही हैं। हमें सिर्फ महिला ही नहीं बल्कि एक नागरिक के तौर पर भी देखा जाना चाहिए। ममता बनर्जी ने इसके लिए काम भी किया है। 2011 में वे पहली बार सत्ता में आईं, तो उन्होंने सबसे पहले पंचायत कानून में संशोधन किया।’ महिला दिवस से जुड़ी ये खबरें भी पढ़ें…
1. दो परमाणु हमले झेल गईं फुकुई किनुयो, ऐसी 8 जीवट महिलाओं की कहानी पाकिस्तान की मुख्तार माई जिन्हें पंचायत में गैंगरेप की सजा सुनाई गई, जापान की फुकुई किनुयो ने दो बार परमाणु हमला झेला, माताहारी जो जासूसी के लिए मशहूर हुईं। ये वे महिलाएं हैं, जो मुश्किल हालात में भी डटीं रहीं और मिसाल बन गईं। पढ़िए पूरी खबर 2. कभी पत्नी की जान लेना पति का हक था, पढ़ने पर जिंदा जला दी जाती थीं महिलाएं आज यूरोप और अमेरिका में महिलाएं करियर या शादी से जुड़े फैसले खुद कर सकती हैं। हमेशा से ऐसा नहीं था। एक दौर ऐसा भी था, जब महिलाओं को मवेशियों की तरह बेचा जाता था। पढ़ने की बात करने पर जिंदा जला दिया जाता था। गैर मर्द के साथ देखी गईं तो पति उन्हें जान से मारने का अधिकार रखता था। महिला अधिकारों की कहानी। पढ़िए पूरी खबर…
फ्री बस से हर महीने 2-3 हजार रुपए बचे, इनसे किताबें खरीदती हूं
दीपाली दिल्ली के सीमापुरी में रहती हैं। अक्सर बस में सफर करती हैं। दीपाली कहती हैं, ‘फ्री बस की स्कीम ऐसी है, जिसके लिए कोई फार्म नहीं भरना पड़ता। सीधा फायदा मिलता है। मैं सीमा डिपो से बस लेती हूं। ऑफिस के लिए लाजपतनगर जाती हूं। पहले मेरे हर महीने 2-3 हजार रुपए खर्च हो जाते थे। अब ये बच जाते हैं। मुझे किताबों और म्यूजिक का शौक है। आने-जाने का पैसा बच रहा है, तो उसे किताबों पर खर्च करती हूं।’ किरदार- ऊषा देवी, दिल्ली ‘पैसा हाथ में आए, तो परिवार की मदद हो जाएगी’
45 साल की ऊषा देवी दिल्ली के शालीमार बाग इलाके में रहती हैं। उनका परिवार UP के इटावा में रहता था, फिर दिल्ली में बस गया। घर में पति, बेटा और बेटी हैं। दिल्ली में महिलाओं के लिए फ्री इलाज और बस के सफर जैसी योजनाएं हैं, लेकिन ऊषा कहती हैं कि इसका बहुत फायदा नहीं है। उन्हें सरकार की तरफ से मिलने वाले 2500 रुपए का इंतजार है। ऊषा बताती हैं, ‘मैं एक स्कूल में काम करती थी। लॉकडाउन के बाद काम छूट गया। पति बीमार हैं, इसलिए घर पर रहती हूं। चार-पांच साल पहले पति का ऑपरेशन हुआ था। वे सिलाई करते थे। ऑपरेशन के बाद काम नहीं कर पाते। दोनों बच्चे एक फैक्ट्री में काम करते हैं। एक को 8 हजार रुपए और दूसरे को 7 हजार रुपए मिलते हैं।’ ‘बेटी भी बीमार रहती है। उसके हाथ और पैरों में सूजन रहती है। 6-7 महीने से वो काम पर नहीं जा पाती। अंबेडकर अस्पताल से उसका इलाज चल रहा है। इलाज तो मुफ्त है, लेकिन दवा का खर्च उठाना पड़ता है। पति और बेटी की दवा पर हर महीने 5 हजार रुपए खर्च होते हैं। फ्री बस का क्या करें, बेटी इस हालत में नहीं है कि उसे बस से अस्पताल ले जाऊं।’ आप परिवार के कहने पर वोट देती हैं या अपनी मर्जी से? जवाब में ऊषा कहती हैं, ‘अपनी मर्जी से वोट डालती हूं। मुझे कोई नहीं बताता किसे वोट देना है। आम आदमी पार्टी की सरकार अच्छा काम कर रही थी। बिजली और पानी फ्री कर दिया था। इस बार BJP को वोट दिया है। दोनों पार्टियों ने अकाउंट में पैसे भेजने की बात कही थी। कैसे आएगा ये नहीं पता।’ किरदार- किरण, दिल्ली ‘सारे फैसले पति करते हैं, लेकिन वोट अपनी मर्जी से देती हूं’
35 साल की किरण सिलाई का काम करती हैं। सीलमपुरी में रहती हैं। पति बीमार रहते हैं, इसलिए घर की जिम्मेदारी किरण पर है। उनका परिवार बिहार के मुजफ्फरपुर से दिल्ली आया है। फ्री वाली योजनाओं पर किरण कहती हैं, ‘फ्री बस तो उनके लिए है, जो बाहर निकलती हैं। मैं घर से काम करती हूं। जो महिलाएं घर पर रहती हैं, सरकार को उन्हें काम देना चाहिए। हम काम करेंगे तो घर में कुछ पैसा आएगा। सरकार 2500 रुपए देने वाली है, इसमें क्या होगा। मेरे दो छोटे बेटे और दो बेटियां हैं। बीमारी की वजह से पति रोज काम पर नहीं जा पाते।’ हमने पूछा वोट डालते वक्त क्या सोचती हैं, क्या परिवार से कोई बताता है कि किसे वोट देना है? किरण कहती हैं, ‘घर के सारे फैसले पति करते हैं। वोट मैं अपनी मर्जी से देती हूं। कोई भी सरकार हो, मैं तो काम करूंगी ही।’ किरदार- पपिया चौधरी, पश्चिम बंगाल
चार साल से पैसे मिल रहे, बेटी की फीस भरती हैं
पपिया चौधरी कोलकाता में रहती हैं। घर में पपिया और उनकी एक बेटी है। पपिया हर महीने 10 हजार रुपए कमाती हैं। उन्हें लक्ष्मी भंडार योजना के एक हजार रुपए मिलते हैं। पपिया कहती हैं, ‘सरकार से मिलने वाले पैसों से बहुत मदद हो जाती है। पैसे मिलते हुए करीब 4 साल हो गए। मेरा खर्च मैं निकाल लेती हूं। कभी बेटी की ट्यूशन फीस देने में परेशानी होती है, तब ये पैसा काम आता है। सरकार अगर पैसा थोड़ा और बढ़ा दे तो अच्छा होगा।’ एक्सपर्ट बोले- महिलाओं को पैसे देने से बच्चों की पढ़ाई सुधरेगी
इंडियन स्कूल ऑफ डेमोक्रेसी के को-फाउंडर प्रखर भारती बताते हैं, ‘राजनीतिक मुद्दों का सीधा असर हाशिए पर रहने वाले समाज पर पड़ता है। उन्हें इससे फर्क पड़ता है कि सरकार किसकी बनी है। इसलिए महिलाओं के वोट ज्यादा होते हैं। महिलाओं में जागरूकता बढ़ी है। उन्हें समझ आने लगा है कि जो भी सत्ता में आएगा, उसका असर उनके निजी जीवन पर पड़ेगा।’ ‘इसकी शुरुआत बिहार में नीतीश कुमार के आने से हुई थी। फिर ओडिशा में नवीन पटनायक और बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार में इसका असर दिखा। अब पूरे देश में महिलाओं पर फोकस करते हुए पॉलिसी बनाई जा रही हैं। उन्हें वोट बैंक के तौर पर देखने की शुरुआत पिछले 10 साल से हुई है। महिलाएं संगठित हो रही हैं, इसलिए उनकी सुनी भी जा रही है।’ ‘महिलाओं को फ्री बस सर्विस मिल रही है। वर्कफोर्स में उनकी हिस्सेदारी 50% है। अगर उनके पास आने-जाने का साधन नहीं होगा तो वे काम पर नहीं जा पाएंगी। फैक्ट्री में काम करने वाली महिलाओं को 7 से 8 हजार रुपए महीना मिलता है। पहले 3-4 हजार रुपए तो आने-जाने पर खर्च हो जाते थे। अब ये पैसा बच रहा है।’ प्रखर आगे बताते हैं, ‘अगर किसी महिला के अकाउंट में 2500 रुपए आ रहे हैं, तो उनके बच्चे की पढ़ाई और परिवार की सेहत बेहतर होगी। इसका असर परिवार पर पड़ता है। यह साबित हो चुका है कि जब पैसा और सत्ता महिलाओं के हाथ में हो, तो उसका इस्तेमाल परिवार की भलाई में होता है। पुरुष नेता चुनकर आते हैं, तो उनका निवेश इन्फ्रास्ट्रक्चर पर ज्यादा होता है। महिलाएं परिवार, टॉयलेट, सफाई, स्कूल और अस्पताल के मुद्दों पर फोकस करती हैं।’ ‘महिलाओं के लिए 1500 रुपए के भी बहुत मायने’
वहीं, प्रो. विभूति पटेल कहती हैं, ‘महिलाएं अब खुद तय करती हैं कि उन्हें किसे वोट देना है। हमारी दादी की पीढ़ी से अब तक यह बदलाव तो आ गया है। इस पीढ़ी की लड़कियों में आजादी की भावना है। सरकार महिलाओं को सीरियसली लेने लगी है। राज्य सरकारें महिलाओं को 1000 से 2500 रुपए तक देती हैं। हम महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में जाते हैं। वहां की महिलाओं के लिए 1500 रुपए भी बहुत मायने रखते हैं। ‘ये वो इलाके हैं, जहां राशन नहीं पहुंच रहा है। चावल और गेहूं मिल रहा है, लेकिन दाल महंगी है। पैसे मिलने से महिलाओं की पर्चेजिंग पावर बढ़ी है। इससे इकोनॉमी को भी फायदा हुआ है।’ ‘महिलाओं को पैसे मिलेंगे, तो वो पहले बेटी की फीस भरेंगी’
प्रगतिशील महिला संगठन की महासचिव पूनम कौशिक बताती हैं, ‘सरकार को भी महिलाओं की ताकत पता है। 2016 में सरकार ने PF से जुड़े नियम बदलने की कोशिश की थी। तब बेंगलुरु में महिलाएं मार्च करने निकल आई थीं। दो दिन वे सड़कों पर रहीं, तीसरे दिन सरकार को फैसला वापस लेना पड़ा।’ पॉलिटिकल पार्टियां क्या कहती हैं… BJP: वक्त बदल गया, अब फैमिली महिलाओं के कहने पर वोट देती है
दिल्ली में BJP की महिला मोर्चा अध्यक्ष ऋचा पांडे बताती हैं, ‘महिलाओं के वोट बढ़ रहे हैं। इसका एहसास हमें 2019 के चुनाव के बाद ही हो गया था। हमने महिलाओं को जोड़ा। पॉलिटिक्स में उनकी हिस्सेदारी बढ़ाई। हर बूथ पर हमारी महिला प्रहरी रहती हैं, जो वोटिंग वाले दिन महिलाओं को वोट देने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। अपने इलाके में 500 से 600 महिलाओं को सरकार की योजनाओं से जोड़ती हैं।’ ऋचा पांडे आगे कहती हैं, ‘महिलाओं की आर्थिक स्थिति बेहतर हो रही है। इसलिए समाज में उनका दर्जा बढ़ा है। अगर हम महिलाओं को समझा दें, तो पूरा परिवार एक ही पार्टी को वोट देगा। परिवार का वोट बिखरता है, तो इसका नुकसान होता है।’ TMC: डायरेक्ट कैश स्कीम से महिलाएं मजबूत हुईं
पश्चिम बंगाल सरकार में मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य बताती हैं, ‘हमारी मुख्यमंत्री समझती हैं कि देशभर में महिलाएं समान भागीदारी और अधिकारों के लिए लड़ रही हैं। हमें सिर्फ महिला ही नहीं बल्कि एक नागरिक के तौर पर भी देखा जाना चाहिए। ममता बनर्जी ने इसके लिए काम भी किया है। 2011 में वे पहली बार सत्ता में आईं, तो उन्होंने सबसे पहले पंचायत कानून में संशोधन किया।’ महिला दिवस से जुड़ी ये खबरें भी पढ़ें…
1. दो परमाणु हमले झेल गईं फुकुई किनुयो, ऐसी 8 जीवट महिलाओं की कहानी पाकिस्तान की मुख्तार माई जिन्हें पंचायत में गैंगरेप की सजा सुनाई गई, जापान की फुकुई किनुयो ने दो बार परमाणु हमला झेला, माताहारी जो जासूसी के लिए मशहूर हुईं। ये वे महिलाएं हैं, जो मुश्किल हालात में भी डटीं रहीं और मिसाल बन गईं। पढ़िए पूरी खबर 2. कभी पत्नी की जान लेना पति का हक था, पढ़ने पर जिंदा जला दी जाती थीं महिलाएं आज यूरोप और अमेरिका में महिलाएं करियर या शादी से जुड़े फैसले खुद कर सकती हैं। हमेशा से ऐसा नहीं था। एक दौर ऐसा भी था, जब महिलाओं को मवेशियों की तरह बेचा जाता था। पढ़ने की बात करने पर जिंदा जला दिया जाता था। गैर मर्द के साथ देखी गईं तो पति उन्हें जान से मारने का अधिकार रखता था। महिला अधिकारों की कहानी। पढ़िए पूरी खबर…