सवाल- मैं इंदौर से हूं। मैं और मेरे पति यहां नौकरी करते हैं। हमारे दो बच्चे हैं, एक 8 साल का और दूसरा 12 साल का। इस समय उनके स्कूल की छुट्टियां चल रही हैं। इस बार दोनों बच्चे अपने दादा-दादी के पास गांव जाकर कुछ दिन बिताने के लिए बहुत उत्साहित हैं। वे वहां की खुली हवा, खेत-खलिहान और गांव के माहौल को लेकर बेहद रोमांचित हैं। लेकिन एक मां के रूप में मुझे कई चिंताएं सता रही हैं। दरअसल गांव का वातावरण शहर से बिल्कुल अलग होता है। वहां बच्चे अक्सर तेज धूप में बाहर खेलते हैं, जिससे उनकी सेहत पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा गांव के स्वतंत्र माहौल में वे वहां के अन्य बच्चों के साथ घुल-मिल सकते हैं और उनसे गलत आदतें जैसे गाली देना, झगड़ना या अनुशासनहीन व्यवहार सीख सकते हैं। साथ ही उनकी नियमित दिनचर्या जैसे समय पर सोना, उठना खाना-पीना और पढ़ाई वगैरह भी बिगड़ सकती है। हालांकि उनके दादा-दादी उन्हें बेहद प्यार करते हैं, लेकिन अब उनकी उम्र हो गई है। ऐसे में वे चाहकर भी बच्चों का पूरी तरह से ध्यान नहीं रख पाएंगे। इन्हीं सब बातों को लेकर मैं असमंजस में हूं कि क्या बच्चों को गांव भेजना सही होगा या नहीं। कृपया मार्गदर्शन करें। एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर जवाब- मैं आपकी दुविधा को पूरी तरह से समझ सकती हूं। एक मां के तौर पर अपने बच्चों के प्रति ऐसी चिंता होना स्वाभाविक है। खासतौर बच्चे जब पहली बार लंबे समय तक पेरेंट्स से दूर जाते हैं, वो भी गांव जैसे माहौल में तो दिल और दिमाग में इस तरह के सवाल आना लाजिमी है। लेकिन एक साइकोलॉजिस्ट के तौर पर मैं कहना चाहूंगी कि बच्चों का गांव जाना खासकर दादा-दादी के पास, उनके लिए एक बेहतरीन अनुभव हो सकता है। गांव बच्चों को उनकी जड़ों से जोड़ता है। वहां का जीवन शहर से बिल्कुल अलग होता है। खुला आसमान, हरियाली से भरे खेत, पेड़-पौधे, जानवर, मिट्टी की सोंधी खुशबू, वहां की हर चीज असली और सीधे दिल से जुड़ी होती है। बच्चे देख पाते हैं कि गेहूं खेत से आता है, आम पेड़ पर कैसे लगता है, गाय कैसे दूध देती है। यानी जो चीजें वे किताबों में पढ़ते हैं या टीवी पर देखते हैं, उन्हें असल में होते हुए देखना उनके लिए एक नई सीख होती है। शहर में बच्चे अक्सर मोबाइल और टीवी में उलझे रहते हैं। वहीं गांव में उन्हें खेलने के लिए खुला मैदान, बात करने के लिए दादा-दादी और सीखने के लिए असली जिंदगी मिलती है। बुजुर्गों के साथ रहकर वे कहानियों, पारिवारिक मूल्यों और रिश्तों की अहमियत समझते हैं। कई रिसर्च भी यही कहती हैं कि प्राकृतिक वातावरण रहना और दादी-नानी के साथ समय बिताना बच्चों को भावनात्मक और मानसिक रूप से मजबूत बनाता है। तो मेरा सुझाव यही होगा कि बच्चों को यह अनुभव लेने दीजिए। ये दिन उनके जीवन के सबसे सुंदर और यादगार लम्हों में शामिल होंगे और शायद आपके लिए भी ये सुकून का एक छोटा सा मौका होगा। बच्चों का प्रकृति के साथ समय बिताना जरूरी नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में पब्लिश एक स्टडी बताती है कि प्रकृति बच्चों के फिजिकल और मेंटल ग्रोथ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जो बच्चे छोटी उम्र से ही प्राकृतिक वातावरण में पलते-बढ़ते हैं, वे बड़े होकर ज्यादा सामाजिक होते हैं और शारीरिक रूप से भी एक्टिव रहते हैं। इसके ठीक उलट, जो बच्चे बचपन में ज्यादा समय घर के अंदर रहते हैं, वे कम एक्टिव रहते हैं, उनमें कोर्टिसोल लेवल ज्यादा होता है। इससे उनमें गुस्सा और चिड़चिड़ापन हो सकता है। अमेरिकी ऑर्गेनाइजेशन ‘चाइल्ड माइंड इंस्टीट्यूट’ की एक रिपोर्ट भी यही बताती है कि बच्चों के ओवरऑल ग्रोथ के लिए प्रकृति के साथ समय बिताना बेहद जरूरी है। वहीं अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के मुताबिक, प्रकृति के बीच समय बिताने से स्ट्रेस, एंग्जाइटी कम होती है और मूड बेहतर होता है। इसके कुछ और भी फायदे हैं। बच्चों के विकास में ग्रैंडपेरेंट्स का रोल ग्रैंडपेरेंट्स के साथ समय बिताने से बच्चों को बहुत कुछ सीखने को मिलता है। दादा-दादी और नाना-नानी बच्चों को बिना शर्त प्यार देते हैं, जो उनके आत्मविश्वास को मजबूत करता है। जब बच्चा यह महसूस करता है कि उसे बिना शर्त के स्वीकार किया जा रहा है तो उसके भीतर आत्मसम्मान और भावनात्मक स्थिरता विकसित होती है। बुजुर्गों के पास अनुभवों का खजाना होता है। उनके साथ रहकर बच्चे धैर्य, सहनशीलता, समझदारी और समस्याओं से निपटने का व्यवहारिक तरीका जैसे जीवन की वे बातें सीखते हैं, जो किताबों या स्कूलों में नहीं सिखाई जा सकती हैं। किस्से-कहानियों के जरिए बच्चों की कल्पनाशक्ति, सुनने की क्षमता और लैंग्वेज स्किल बेहतर होती है। इसके अलावा ग्रैंडपेरेंट्स के साथ समय बिताने से बच्चों में करुणा, सहानुभूति और सहयोग की भावना डेवलप होती है। इंडिपेंडेंट सिस्टम रिसर्च, एजुकेशन एंड इनोवेशन ग्रुप ‘द लिगेसी प्रोजेक्ट’ की एक रिसर्च के मुताबिक, दादा-दादी या नाना-नानी बच्चों के भावनात्मक और सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह केवल बच्चों के लिए ही नहीं, बल्कि ग्रैंडपेरेंट्स के लिए भी फायदेमंद है। ग्रैंड चिल्ड्रेन के साथ समय बिताने से उन्हें अपने वैल्यू को साझा करने, एक्टिव रहने और बचपन को फिर से अनुभव करने का माैका मिलता है। बच्चों को अपने ग्रैंडपेरेंट्स से और भी बहुत कुछ सीखने को मिलता है- हालांकि आपकी चिंताएं बिल्कुल स्वाभाविक हैं। तो चलिए, एक-एक करके उन पर बात करते हैं और देखते हैं कि इसमें बतौर पेरेंट आप क्या कर सकती हैं। बच्चों की सेहत की चिंता इसके लिए दादा-दादी से बात करें कि बच्चों को दोपहर की तेज धूप में बाहर न निकलने दें। उन्हें सुबह या शाम में ही खेलने की अनुमति दें। यह सुनिश्चित करने के लिए कि बच्चे पर्याप्त पानी पिएं, आप उन्हें कुछ ORS या ग्लूकोज पाउडर के पैकेट भी दे सकती हैं। साथ ही बच्चों के खाने-पीने की आदतों के बारे में दादा-दादी को स्पष्ट रूप से बताएं। इससे बच्चों की सेहत काफी हद तक ठीक रहेगी। गलत आदतों का डर इसके लिए बच्चों को गांव भेजने से पहले उनसे खुलकर बात करें। उन्हें समझाएं कि कौन सी बातें अच्छी होती हैं और कौन सी बुरी। उन्हें बताएं कि अगर कोई बच्चा गाली दे या झगड़ा करे तो उन्हें इन सब चीजों से दूर रहना है और इसके बारे में दादा-दादी को बताना है। दादा-दादी से भी ये बताएं कि वे बच्चों पर थोड़ी नजर रखें और अगर कुछ गलत देखें तो उन्हें तुरंत रोकें। इसके साथ ही बच्चों से नियमित रूप से फोन पर बात करती रहें ताकि पता चलता रहे कि वे क्या कर रहे हैं। असंतुलित दिनचर्या इसके लिए गांव जाने से पहले बच्चों के साथ उनकी दिनचर्या का एक छोटा सा चार्ट बनाएं। इसमें सोने-उठने का समय, खाने का समय और थोड़ा सा पढ़ाई का समय भी शामिल करें। दादा-दादी को भी इस चार्ट के बारे में बताएं। आप बच्चों को कुछ किताबें और कॉपी साथ भिजवा सकती हैं और उनसे कह सकती हैं कि वे रोज थोड़ी देर पढ़ें। गांव में खेल-कूद का भी भरपूर मौका मिलेगा, इसलिए पढ़ाई का बहुत ज्यादा बोझ न डालें। हां, मोबाइल और टीवी देखने के समय पर थोड़ा कंट्रोल रखने को कहें। दादा-दादी की उम्र का रखें ख्याल सबसे जरूरी बात दादा-दादी की उम्र को समझें और उनसे बहुत ज्यादा उम्मीदें न रखें। अगर गांव में कोई और विश्वसनीय रिश्तेदार या पड़ोसी हैं तो आप उनसे भी बात कर सकती हैं कि वे बच्चों पर थोड़ी नजर रखें। सबसे जरूरी है कि आप नियमित रूप से दादा-दादी और बच्चों दोनों से फोन पर बात करती रहें ताकि पता चलता रहे और वे भी अकेला महसूस न करें। अंत में यही कहूंगी कि बच्चों को गांव भेजना उनके लिए एक यादगार अनुभव हो सकता है। आपकी चिंताएं स्वाभाविक हैं, लेकिन थोड़ी सी तैयारी और दादा-दादी के साथ स्पष्ट बातचीत से इन चिंताओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है। ध्यान रखें कि आप बच्चों को गांव सिर्फ छुट्टियां मनाने नहीं भेज रही हैं, बल्कि उन्हें जीवन के कुछ महत्वपूर्ण सबक सीखने, अपने परिवार से जुड़ने और प्रकृति के करीब जाने का मौका दे रही हैं। यह उनके सर्वांगीण विकास के लिए एक बहुत ही सकारात्मक कदम हो सकता है। ……………… पेरेंटिंग की ये खबर भी पढ़िए पेरेंटिंग- मेरी 9 साल की बेटी को जल्दी आएंगे पीरियड्स: मैं उसे इस बारे में अभी से कैसे बताऊं, शर्म और संकोच महसूस होता है आज के समय में बच्चियों को इस बारे में सही जानकारी देना बहुत जरूरी है ताकि वे खुद को और अपनी शरीर को अच्छे से समझ सकें। लेकिन अफसोस है कि हमारे देश में पीरियड्स को लेकर इतनी कम जागरूकता है कि इक्कीसवीं सदी में भी लोग इस पर बात करने में शर्म महसूस करते हैं। पूरी खबर पढ़िए…