पेरेंटिंग- 3 साल की बेटी को छोड़कर विदेश चले गए:6 साल बाद अब वो हमारे पास नहीं लौटना चाहती, हम उसका भरोसा कैसे जीतें

सवाल- मैं अपने परिवार के साथ दिल्ली में रहती हूं। मेरी 11 साल की एक बेटी है। जब वह 3 साल की थी तो हमें उसे कुछ वक्त के लिए छोड़कर बाहर जाना पड़ा। मेरे पति की मस्कट में जॉब थी। मुझे भी उनके साथ जाना पड़ा। हम 6 साल बाहर रहे और उस दौरान वह हमारी जेठ-जेठानी के साथ रही। 6 सालों में हमारा एक-दो बार ही इंडिया आना हुआ। हालांकि स्काइप और फोन पर हमारी बातें होती थी, लेकिन फिर भी शायद हमारे बीच उतनी अच्छी बॉन्डिंग नहीं बन पाई। जब हम लौटकर आए तो बेटी वो घर छोड़कर हमारे साथ दिल्ली आने को तैयार नहीं थी। शायद वो उसे ही अपना असली घर समझने लगी थी। गलती हमारी भी है कि बच्ची को इतनी कम उम्र में अकेले नहीं छोड़ना चाहिए था। लेकिन हम भी मजबूर थे, हमारे पास कोई विकल्प नहीं था। पिछले 2 साल से वह हमारे साथ है, लेकिन हमें लगता है कि उसका व्यवहार उसकी उम्र के बच्चों जैसा नहीं है। वह बाहर जाकर बच्चों के साथ खेलना पसंद नहीं करती, हमेशा अपने कमरे में रहती है। वह पढ़ने में अच्छी है, ध्यान से पढ़ाई करती है। लेकिन बाकी उसकी हरकतें और आदतें उसके उम्र के बच्चों जैसी नहीं हैं। जैसे कहीं भी उसे लेकर जाना चाहो, बर्थडे पार्टी या फैमिली फंक्शन तो वो हमेशा मना ही करती है। अगर हम जिद करके ले भी जाएं तो एक कोने में बैठी रहती है। किसी से घुलती-मिलती नहीं है। मैंने अपने जेठ-जेठानी से इस बारे में बात की। उनका कहना है कि पहले तो ऐसा नहीं था। अभी तुम लोग जब से उसे दोबारा अपने साथ जबरदस्ती लेकर गए हो, तभी ऐसा हो रहा है। कृपया मुझे बताएं कि हम क्या करें कि बच्ची हमको वापस अपने पेरेंट्स की तरह स्वीकार करे। हम पर वापस विश्वास करे और हमारे बीच फिर से पहले जैसा कनेक्शन बन सके। एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर जवाब- आपकी बातों से साफ है कि आप एक संवेदनशील और जागरूक मां हैं। जो हुआ, वह उस समय की परिस्थितियों और मजबूरी का हिस्सा था। लेकिन आज आप अपनी बेटी की भावनात्मक स्थिति को लेकर चिंतित हैं और उससे दोबारा जुड़ने की कोशिश कर रही हैं। यह बहुत ही अच्छी बात है। आपकी बच्ची का व्यवहार बताता है कि वह अंदर ही अंदर एक गहरे भावनात्मक संघर्ष से जूझ रही है। इतनी छोटी उम्र में माता-पिता से अलग होना और पूरे 6 साल एक अलग परिवार के साथ रहना उसके लिए एक बड़ा ट्रॉमा हो सकता है। भले ही वह इसे खुलकर जाहिर न कर पाए। बचपन में बच्चा जिनके साथ दिन-रात बिताता है, जिनसे उसे इमोशनल सिक्योरिटी मिलती है, वही उसके लिए अपने बन जाते हैं। आपकी बेटी ने भी अपने बड़े पापा-मम्मी के साथ एक गहरा अटैचमेंट बना लिया था। अब अचानक उस सुरक्षित घेरे से निकलकर एक नई स्थिति में आ जाना, भले ही वो अपने असली माता-पिता के पास ही क्यों न हो, उसके लिए असहज और उलझाने वाला हो सकता है। वह बदलाव को अब भी पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाई है। ये जरूरी नहीं कि वह अपने मन की बात आपको शब्दों में बता पाए। बच्चों की भावनाएं अक्सर उनके व्यवहार के जरिए ही सामने आती हैं। जैसे खुद को कमरे तक सीमित कर लेना, बाहर खेलने से बचना या सोशल इवेंट्स में हिस्सा न लेना। लेकिन अच्छी बात यह है कि बच्ची का दिमाग अभी डेवलपिंग स्टेज में है। तो सही समझ, प्यार और धैर्य के साथ आप उसका विश्वास दोबारा जीत सकती हैं और आपके रिश्ते फिर से मजबूत हो सकते हैं। इसके लिए जरूरी है कि आप कुछ बातों का ध्यान रखें और लगातार छोटे-छोटे प्रयास करें। इसमें समय लगेगा, लेकिन धीरे-धीरे बदलाव जरूर आएगा। आइए, अब इन पॉइंट्स को समझते हैं। बच्ची के इमोशनल ट्रॉमा को समझें आपने बच्ची को जन्म दिया है, लेकिन उसके बचपन की गहरी यादें किसी और के साथ जुड़ी हैं। ऐसे में जरूरी है कि आप उसकी इस भावनात्मक स्थिति को समझें, न कि उसे जज करें। उसकी भावनाओं को स्वीकार करना ही उसके साथ रिश्ता दोबारा बनाने की पहली और सबसे जरूरी सीढ़ी है। उसकी बात बिना टोके और बिना सलाह दिए ध्यान से सुनें जब वह कुछ बोले, चाहे वो स्कूल की बात हो या कुछ और तो बिना रोकटोक उसे बस सुनें। हो सकता है कि वह बहुत कुछ न कहे, लेकिन जब उसे लगेगा कि कोई उसे जज नहीं कर रहा तो वह धीरे-धीरे खुलने लगेगी। हर दिन कुछ वक्त सिर्फ उसके लिए ही निकालें आपकी बेटी को यह भरोसा चाहिए कि अब आप सच में हर दिन, हर पल उसके साथ हैं। इसलिए दिन का कोई एक वक्त ऐसा जरूर चुनिए, जब न टीवी हो, न फोन बस आप, आपके पति और आपकी बेटी एक साथ हों। साथ में बैठकर खाना खाएं, टहलने जाएं, कोई गेम खेलें या बस बातें करें ये छोटी-छोटी मुलाकातें धीरे-धीरे उसके मन में आपकी जगह फिर से मजबूत करेंगी। उसकी पसंद-नापसंद समझें उसे क्या खाना पसंद है, कौन सी फिल्में देखना पसंद है, क्या नहीं खाना चाहती जैसी हर छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखें। इन सवालों को ऐसे पूछिए जैसे कोई दोस्त पूछता है। जब उसे ये महसूस होगा कि आप उसकी इंटरेस्ट में दिलचस्पी ले रहे हैं, न कि उसे बदलने की कोशिश कर रहे हैं, तब वो भी आपको अपने मन की दुनिया में धीरे-धीरे शामिल करने लगेगी। पुरानी तस्वीरें, यादें और बातें शेयर करें कभी-कभी उसके साथ बैठकर उसके बचपन की तस्वीरें देखें। मुस्कुराते हुए कहिए, ‘देखो, जब तुम छोटी थी तो ऐसे मुस्कराती थी… ऐसे सोती थी…।’ ये छोटे पल उसे यह महसूस कराएंगे कि आप सिर्फ अब उसके साथ नहीं हैं, बल्कि तब भी थे, जब वो बहुत छोटी थी। इन यादों के जरिए आप उसकी भावनाओं से दोबारा जुड़ सकते हैं। उस पर दबाव न बनाएं, बल्कि स्पेस दें जब वह बात न करना चाहे या अपने कमरे में रहना चाहे तो उसे थोड़ा स्पेस दीजिए। हर बार ये जरूरी नहीं कि वह कुछ छुपा रही है या गलत कर रही है। कई बार बच्चे अपने भीतर की उलझनों को खुद समझने की कोशिश करते हैं। उसे थोड़ा स्पेस देना, यह जताता है कि आप उसके बदलावों को समझते हैं और उस पर भरोसा करते हैं। भरोसा ही रिश्ते की बुनियाद होती है। उसे जो करना अच्छा लगता है, उसमें उसे सपोर्ट करें अगर उसे पढ़ना अच्छा लगता है तो उसके लिए कहानियों की नई किताबें लाइए। अगर वह पेंटिंग या ड्रॉइंग करती है तो उसकी बनाई चीजों को फ्रेम करके दीवार पर लगाइए। जब आप उसके इंटरेस्ट को सपोर्ट करते हैं तो उसे ये महसूस होता है कि आप उसके अपने हैं। यही एहसास उसे धीरे-धीरे आपके करीब लाता है। अपनी गलती स्वीकार करें आप बच्ची को अपनी मजबूरियां भी बता सकती हैं कि आपने उसे अकेला क्यों छोड़ा था। आप कह सकती हैं कि ‘हां, हमें तुझे उस उम्र में छोड़ना नहीं चाहिए था। लेकिन हम मजबूर थे। अब हम चाहते हैं कि तुम्हारे हर पल में हम हों‘। यह मानना कि गलती हुई, बच्ची को आपकी सच्चाई से जोड़ता है। बच्चे से जुड़ने की चाह में इन बातों का रखें खास ध्यान कई बार पेरेंट्स जाने-अनजाने में ऐसे व्यवहार करने लगते हैं, जो रिश्ते को ठीक करने की जगह और उलझा देते हैं। इसलिए जितना जरूरी यह जानना है कि क्या करें, उतना ही जरूरी है यह समझना कि क्या नहीं करना चाहिए। तो ये 5 गलतियां बिल्कुल न करें। उसे अपने बड़े पापा-मम्मी से दूर न करें आपकी बेटी ने अपने जीवन के शुरुआती साल अपने बड़े पापा-मम्मी के साथ बिताए हैं। उनके साथ उसका रिश्ता अपनेपन का है। इसलिए बच्ची को उनसे मिलने-जुलने की पूरी आजादी दें। हफ्ते में एक बार उन्हें घर बुला लें या वीकेंड पर बेटी के साथ उनके घर जाएं। जब आप खुद यह अपनापन दिखाएंगी और उससे कहेंगी कि ‘हमें पता है कि तुम्हें उनके साथ रहना अच्छा लगता था, वो भी तुम्हारा परिवार है’ तो वह खुद को आपके और उनके बीच बंटा हुआ नहीं, बल्कि दोनों जगह सुरक्षित महसूस करने लगेगी। अंत में यही कहूंगी कि बच्चों का भरोसा धीरे-धीरे लौटता है, ये एक दिन का काम नहीं होता है। आपका धैर्य, सच्चा प्यार और सपोर्ट ही उसकी हीलिंग की सबसे बड़ी दवा है। …………………
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