कभी पत्नी की जान लेना पति का हक था:पढ़ने पर जिंदा जला दी जाती थीं महिलाएं, 6 चैप्टर्स में समझिए महिला अधिकारों का पूरा इतिहास

आज यूरोप और अमेरिका में महिलाएं करियर या शादी से जुड़े फैसले खुद कर सकती हैं। हर प्रोफेशन में ऊंचा मुकाम हासिल कर सकती हैं। लेकिन हमेशा से ऐसा नहीं था। आज विकसित मानी जाने वाली पश्चिमी सभ्यता में एक दौर ऐसा भी था जब महिलाओं को मवेशियों की तरह बेचा जाता था। पढ़ने की बात करने पर जिंदा जला दिया जाता था। गैर मर्द के साथ देखी गईं तो पति उन्हें जान से मारने का अधिकार रखता था। आखिर पिछड़ेपन के उस दौर से आज के AI युग तक महिला अधिकार कैसे बदले…आज महिला दिवस पर इतिहास के 6 चैप्टर्स में समझिए महिला अधिकारों की पूरी कहानी। चैप्टर-1: पाषाण काल यानी स्टोन एज शुरुआत करते हैं पाषाण काल यानी स्टोन एज से…सभ्यता की शुरुआत से पहले महिलाओं और पुरुषों के अधिकार बराबर हुआ करते थे। महिलाओं ने ही शुरू किए आग, खेती और व्यापार स्टोन एज की घटनाओं का कोई पुख्ता रिकॉर्ड तो नहीं है। लेकिन इतिहासकार मानते हैं कि आग को जलाए रखना, खेती, पशुपालन और यहां तक कि व्यापार की शुरुआत भी शायद महिलाओं ने ही थी। किताब ‘लाइफ एंड वर्क इन प्री-हिस्टॉरिक टाइम्स’ में जी. रेनार्ड लिखते हैं कि किसी मादा जानवर के शिकार के बाद उसके जिंदा बच्चों को साथ ले आने और पालने की शुरुआत संभवत: महिलाओं ने ही की थी। महिलाओं ने ही खेती की खोज की। खेती से अनाज, पाले हुए जानवरों से दूध और मांस मिलने लगा। इससे लोगों के लिए भोजन की उपलब्धता चिंता की वजह नहीं रह गई। महिलाओं की इन उपलब्धियों की वजह से ही शायद शुरुआती सभ्यताओं में उन्हें सर्वोच्च देवी का दर्जा देकर पूजा जाने लगा। चैप्टर-2: शुरुआती सभ्यताएं…यूनान, रोम और मिस्र सभ्यताओं के विकास के साथ ही महिला अधिकारों का ग्राफ भी गिरना शुरू हो गया। इसे समझने के लिए प्राचीन ग्रीक (यूनानी) सभ्यता, मिस्र की सभ्यता और रोम की सभ्यता को समझना होगा। इन सभ्यताओं में महिलाओं पर पिता और पति का अधिकार माना जाता था। कुछ इतिहासकार इसे मातृसत्ता से पितृसत्ता की तरफ शिफ्ट का नतीजा मानते थे। वहीं कुछ का मानना है कि संपत्ति पर सामूहिक के बजाय इंडिविजुअल के अधिकार यानी प्राइवेट प्रॉपर्टी की शुरुआत के साथ महिलाओं पर बंदिशें भी बढ़ीं। प्राचीन यूनान में स्पार्टा इस मामले में अपवाद था। वहां पुरुषों और महिलाओं को एक जैसी स्वतंत्रता मिली हुई थी। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि स्पार्टा में संपत्ति निजी नहीं, सामूहिक हुआ करती थी। संपत्ति पर अधिकार का झगड़ा न होने की वजह से महिलाओं को आजादी मिली हुई थी। ग्रीक सभ्यता में आम महिलाओं से ज्यादा अधिकार हाई क्लास वेश्याओं के थे प्राचीन यूनान में महिलाओं को किसी भी तरह के राजनीतिक या सामाजिक अधिकार नहीं थे। कोर्ट में उनकी गवाही तक मान्य नहीं थी। लेकिन उसी दौर में यूनान में कुछ हाई क्लास वेश्याएं भी थीं, जिन्हें हेटाइरा कहा जाता था। ये महिलाएं न सिर्फ काफी पढ़ी-लिखी होती थीं, बल्कि आर्ट, लिटरेचर और फिलॉसफी तक पर पकड़ रखती थीं। इनमें से कई अच्छी कलाकार भी थीं। उस वक्त किसी भी यूनानी महिला को भोज के बाद होने वाली पार्टी में जाने का अधिकार नहीं था। लेकिन हेटाइरा ऐसी पार्टियों में पुरुषों के साथ बैठती थीं। इन वेश्याओं तक सिर्फ अमीर व्यापारियों और शासक वर्ग की पहुंच होती थी। हेटाइरा के साथ कोई भी जोर-जबरदस्ती नहीं कर सकता था। माना जाता है कि अपनी पहुंच के कारण कई हेटाइरा शासन में दखल रखती थीं। प्राचीन मिस्र में कहानी अलग, बेटी को था पिता की संपत्ति पर हक महिला अधिकारों के मामले में प्राचीन मिस्र की स्थिति यूनान से काफी बेहतर थी। यहां कानून के तहत पिता की संपत्ति में एक हिस्सा बेटी को भी मिलता था। कोई महिला अपने पति का व्यापार चला सकती थी। पति के मरने पर पत्नी को उसके साथ मरना नहीं होता था। विधवा महिला दोबारा शादी कर सकती थी। महिलाएं अपने पति को तलाक भी दे सकती थीं। महिलाओं को सरकारी नौकरी करने या धार्मिक पुरोहित बनने की भी छूट थी। प्राचीन रोम में महिलाओं को संपत्ति पर अधिकार था…व्यापार का नहीं 178 ईसवीं में रोमन शासक मार्कस ऑरेलियस ने महिला अधिकारों पर कानून बनाया। इससे पिता की संपत्ति पर बेटे और बेटी को बराबर हक मिला। लेकिन प्राचीन रोम में महिलाओं को किसी भी तरह का अनुबंध करने का अधिकार नहीं था। यानी वे किसी भी तरह की व्यापार का हिस्सा नहीं बन सकती थीं। चैप्टर-3: मध्यकाल का यूरोप यानी सन 400 ईसवीं से 1400 ईसवीं रोमन सभ्यता के पतन के बाद पूरे यूरोप में अलग-अलग देश, राजा और राजवंश हावी थे। लेकिन इन सभी पर हावी था रोमन कैथोलिक चर्च। चर्च सिर्फ सामाजिक अधिकार ही नहीं, राजनीतिक अधिकार भी तय करता था। राजा की ताजपोशी भी चर्च की मंजूरी या आशीर्वाद से होती थी। रूस में पिता अपने दामाद को देता था पीटने का अधिकार मध्य काल में यूरोप में विवाहित महिला किसी गैर-मर्द के साथ पाई जाती तो पति कानूनन उसे जान से मार सकता था। जबकि अगर पति किसी दूसरी महिला के साथ पकड़ा जाए तो जुर्माना देकर बच जाता। वहीं रूस में शादियों के दौरान एक प्रथा प्रचलित थी। पिता एक बेंत से अपनी बेटी को मारता था और फिर वही बेंत अपने दामाद को उपहार में देता था। यानी वो लड़की को पीटने का अधिकार अपने दामाद को देता था। फिजी समेत कई देशों में तो पति के मरने पर पत्नी को उसके साथ ही मार दिया जाता था। चैप्टर-4: 15वीं शताब्दी…पहली बार महिलाओं के अधिकारों पर बात 15वीं शताब्दी तक आते-आते यूरोप में चर्च के बजाय राजाओं का दबदबा बढ़ने लगा। इसके साथ ही महिलाओं के प्रति नजरिये में काफी बदलाव आने लगा। सबसे बेहतर हालात फ्रांस में थे। इतिहासकार इसका श्रेय जोआन ऑफ आर्क को देते हैं। 1428 में 17 साल की जोआन ऑफ आर्क राजा की अनुमति से फ्रांस की सेना में शामिल हुई। इंग्लैंड से लड़ी और जीती। इसके बाद फ्रांस में महिलाओं के अधिकार कई मामलों में पुरुषों के बराबर हो गए थे। महिलाओं के लिए शादी करने की बाध्यता खत्म हो गई थी। महिलाओं को सेना में जगह मिलने लगी थी। वे जमींदार बन सकती थीं, व्यापार कर सकती थीं। लेकिन अब भी महिलाएं राजनीति में कोई दखल नहीं रखती थीं। यही नहीं फ्रांस समेत पूरे यूरोप में कानूनन ज्यादातर प्रोफेशन्स में महिलाओं की एंट्री मना थी। चैप्टर-5: 19वीं सदी…महिलाओं के लिए कॉलेज खुला, मगर अधिकार फिर भी नहीं मिले 1789 में फ्रांस में क्रांति के बाद वहां संसद ने ‘राइट्स ऑफ मैन’ यानी आदमी के अधिकारों का दस्तावेज जारी किया। उसी समय महिला नाटककार ओलियंपे डे गूज ने ‘महिलाओं के अधिकार’ का दस्तावेज प्रकाशित कर दिया। डे गूज की दलील थी कि सिर्फ लिंग के आधार पर पुरुषों को दिया गया कोई भी अधिकार मान्य नहीं है, इसे रद्द कर देना चाहिए। उस समय तक वॉल्टेयर और डेनिस दिदेरो जैसे प्रभावशाली दार्शनिक भी खुलकर महिला अधिकारों की वकालत कर रहे थे। 1860 के दशक में इंग्लैंड के ऑक्सफोर्ड में पहला महिला कॉलेज भी स्थापित हो गया। लेकिन फिर भी हर लड़की के लिए शिक्षा हासिल करना आसान नहीं था। चैप्टर-6: 20वीं सदी…कारखानों में मजदूर बनीं तो संगठित हुईं महिलाएं, हक के लिए लड़ीं महिलाओं को दोयम दर्जे का नागरिक मानने वाले यूरोप में महिला अधिकारों की बात इंडस्ट्रियलाइजेशन के साथ शुरू हुई। 1800 के दौर में यूरोप में मशीनों के आविष्कार से इंडस्ट्री का आकार तेजी से बढ़ा। कारखानों में सस्ते मजदूरों की जरूरत थी और इसके लिए महिलाएं बिल्कुल मुफीद थीं। कारखानों में काम करने वाली महिलाओं को बतौर मजदूर पहली बार संगठित होने का मौका मिला। इन्हीं संगठनों के बीच महिला अधिकारों के आंदोलन पनपे। हालांकि अब भी महिलाओं को समान काम के लिए पुरुषों के बराबर वेतन नहीं मिलता था। लेकिन वर्कफोर्स में उनकी हिस्सेदारी बढ़ गई थी। इसी दौर में महिलाओं ने वोटिंग के अधिकार के लिए संगठित आंदोलन शुरू किए। लेनिन ने पहली बार घोषित की थी महिला दिवस पर छुट्‌टी 1900 के दौर में अमेरिका और यूरोप में महिला मजदूर संगठनों के आंदोलनों में ही पहली बार ‘महिला दिवस’ का जिक्र मिलता है। ‘महिला दिवस’ के नाम पर पहला आंदोलन 1909 में न्यूयॉर्क सिटी में सोशलिस्ट पार्टी ऑफ अमेरिका ने किया था। 8 मार्च को सरकारी छुट्‌टी की शुरुआत पहली बार रूस की कम्युनिस्ट सरकार में व्लादिमीर लेनिन ने की थी। संयुक्त राष्ट्र ने पहली बार 1975 में महिला दिवस को अपनाया और तब से इसे अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस कहा जाने लगा। अब तक यूरोप के सभी देशों में महिलाओं को नहीं वोटिंग का अधिकार ज्यादातर यूरोपीय देशों ने पहले विश्व युद्ध के दौर में ही महिलाओं को वोटिंग के अधिकार दे दिए थे। लेकिन इसमें सबसे बड़ा अपवाद फ्रांस था। 15वीं शताब्दी में ही महिलाओं की समानता की बात करने वाले फ्रांस में महिलाओं को वोट देने का हक 1944 में मिला। ग्रीस में सभी महिलाओं को वोट देने का हक 1952 में मिला। वहीं स्विट्जरलैंड के राष्ट्रीय चुनाव में महिलाओं को वोटिंग का अधिकार 1971 में मिला। वेटिकन सिटी में राष्ट्राध्यक्ष यानी पोप का चुनाव होता है। इस चुनाव में सिर्फ पुरुष कार्डिनल्स ही शामिल होते हैं। भारत के प्राचीन ग्रंथों में महिला अधिकारों की वकालत, ऋग्वेद में पहले प्रेम विवाह का जिक्र भारत में प्राचीन ग्रंथों में महिला अधिकारों की बात करें तो तस्वीर काफी अलग दिखती है। ऋग्वेद में पहले प्रेम विवाह का जिक्र मिलता है। ऋग्वेद के 10वें मंडल के 85वें सूक्त के 9वें मंत्र में सूर्य की बेटी सूर्या के विवाह का वर्णन है। सूर्य अपनी बेटी सूर्या की शादी सोम से करना चाहते थे। लेकिन सूर्या की इच्छा अश्विनी कुमार से शादी करने की थी। बेटी की इच्छा मानते हुए सूर्य ने अश्विनी कुमार से उसकी शादी कर दी, जबकि अश्विनी कुमार पहले से ही एक पुत्र के पिता थे। यानी उस समय में किसी लड़की का किसी शादीशुदा पुरुष से प्रेम करना और शादी करना सामाजिक तौर पर मान्य था। सुश्रुत संहिता के मुताबिक स्वस्थ बच्चों का जन्म तब ही होता है जब माता की उम्र कम से कम 16 वर्ष या उससे अधिक हो। यानी उस वक्त भी बाल विवाह मान्य नहीं था। हालांकि महिला अधिकारों पर कुछ विरोधाभासी तस्वीर भी दिखती है- महाभारत में कहा गया है- पुरुष अगर गुस्से में भी हो तो वो पत्नी से कठोर व्यवहार नहीं कर सकता। पत्नी ही सर्वश्रेष्ठ मित्र है। बाद के मनुस्मृति में कहा गया है- पति भले ही मूर्ख हो, वासना का दास हो, ढंग से बात भी न कर सकता हो, फिर भी पत्नी उसे भगवान की तरह पूजेगी। अंग्रेजों के आने से घटे भारत में महिलाओं के अधिकार भारत वैदिक काल से पुरुष प्रधान समाज था, लेकिन महिलाओं के अधिकार और सम्मान बराबरी के थे। लेकिन बाद के दौर में धार्मिक आडंबर बढ़ने के साथ-साथ महिलाओं के अधिकार घटते गए। संपत्ति में महिलाओं का हिस्सा नहीं रह गया। विधवा होने पर महिला को पति के साथ जला दिया जाता या बाल कटवाकर समाज से अलग-थलग रहना पड़ता। भारत में पहले इस्लामिक और फिर अंग्रेज आक्रमणकारियों के आने से स्थिति और बिगड़ती गई। अंग्रेज अपने साथ महिलाओं के प्रति वही मानसिकता लेकर आए जो यूरोप में चल रही थी। भारत ने आजादी के साथ अपनाई लैंगिक समानता, मगर दुनिया में आज भी महिला अधिकार अधूरे भारत जब 1947 में आजाद हुआ तो लैंगिक समानता को पूरी तरह अपनाया गया। संविधान में महिलाओं और पुरुषों के अधिकारों में कोई भेदभाव नहीं है। हालांकि दुनिया में अभी भी महिलाओं के अधिकारों की तस्वीर एक जैसी नहीं है। समान काम के लिए समान वेतन जैसी चीज के लिए दुनिया भर में महिलावादी संगठन आवाज उठा रहे हैं। ग्राफिक्स: कुणाल शर्मा