सोमवार, 15 जुलाई को आषाढ़ शुक्ल नवमी है। इसे भड़ली नवमी कहते हैं। इस दिन आषाढ़ गुप्त नवरात्रि भी खत्म हो रही है। देवशयनी एकादशी (17 जुलाई) से पहले आने वाली भड़ली नवमी को अबुझ मुहूर्त माना जाता है। इस दिन विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश या नए काम की शुरुआत कर सकते हैं। इस दिन बिना मुहूर्त देखे भी मांगलिक कार्य किए जा सकते हैं। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार भड़ली नवमी गुप्त नवरात्रि की अंतिम तिथि भड़ली नवमी पर गणेश जी, शिव जी और देवी दुर्गा की विशेष पूजा करनी चाहिए। जरूरतमंद लोगों को धन, अनाज, छाता, जूते-चप्पल, कपड़े का दान करना चाहिए। जानिए भड़ली नवमी पर कौन-कौन से शुभ काम किए जा सकते हैं… गणेश जी को पंचामृत से स्नान कराएं। इसके बाद हार-फूल और वस्त्रों से श्रृंगार करें। चंदन का तिलक लगाएं। ऊँ गं गणेशाय नम: मंत्र का जप करें। दूर्वा और लड्डू चढ़ाएं। धूप-दीप जलाकर आरती हैं। शिवलिंग पर तांबे के लोटे से जल चढ़ाएं। पंचामृत अर्पित करें। इसके बाद फिर से जल चढ़ाएं। पंचामृत दूध, दही, घी, मिश्री और शहद मिलाकर बनाया जाता है। शिवलिंग का अभिषेक करने के बाद चंदन का लेप करें। इसके बाद बिल्व पत्र, हार-फूल, आंकड़े के फूल, धतूरा आदि पूजन सामग्री चढ़ाएं। दीपक जलाएं और ऊँ उमामहेश्वराय नम: मंत्र का जप करें। मंत्र जप के लिए रुद्राक्ष की माला का इस्तेमाल करें। शिव जी के साथ ही देवी पार्वती की भी पूजा करें। देवी मां को लाल चुनरी और लाल फूल चढ़ाएं। देवी दुर्गा पार्वती जी का ही एक रूप हैं। शिव-पार्वती की पूजा पति-पत्नी को एक साथ करनी चाहिए। ऐसा करने से घर-परिवार सुख-शांति और आपसी प्रेम बना रहता है। गुप्त नवरात्रि में की जाती है महाविद्याओं की साधना गुप्त नवरात्रि में देवी सती की महाविद्याओं के लिए साधना की जाती है। ये साधनाएं तंत्र-मंत्र से जुड़े साधक ही करते हैं। इन दस महाविद्याओं में मां काली, तारा देवी, षोडषी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, और कमला देवी शामिल हैं। दो ऋतुओं के संधिकाल में आती है नवरात्रि नवरात्रि का संबंध ऋतुओं से है। जब दो ऋतुओं का संधिकाल रहता है, उस समय देवी पूजा का ये पर्व मनाया जाता है। संधिकाल यानी एक ऋतु के खत्म होने का और दूसरी ऋतु के शुरू होने का समय। एक साल में चार बार ऋतुओं के संधिकाल में नवरात्रि आती है।