रिलेशनशिप- असफल होकर ही मिलती है सफलता की मंजिल:आयुष्मान खुराना फेल्योर को बताते हैं अपना सबसे बड़ा शिक्षक

बॉलीवुड एक्टर आयुष्मान खुराना अपने अनकन्वेंशनल (गैरपारंपरिक) रोल्स के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने फिल्मों में कई बेहतरीन किरदार निभाकर अपने फैन्स का दिल जीत लिया। लेकिन जितनी जल्दी उन्हें सफलता मिली, उतनी ही जल्दी असफलता का भी सामना करना पड़ा। उनके लिए यहां तक का सफर आसान नहीं था। अपने स्ट्रगल के दिनों को याद करते हुए आयुष्मान ने हाल ही में एक इंटरव्यू में अपनी असफलताओं के बारे में बताया। आयुष्मान ने कहा, ”मुझे लगता है कि जब आपमें असफलताओं से निपटने की ताकत आ जाती है तो आप सच्चे इंसान बन जाते हैं। सफलता एक फालतू टीचर है और असफलताएं असल में आपकी दोस्त, फिलॉसफर और मार्गदर्शक हैं। यदि आपने जिंदगी के शुरुआती सालों में असफलताओं का अनुभव नहीं किया है तो एक निश्चित उम्र में आने पर उनसे लड़ना और सीखना मुश्किल हो जाता है।” अपनी पहली फिल्म ‘विक्की डोनर’ की अपार सफलता के बाद आयुष्मान खुराना को बहुत सारी असफलताओं का मुंह देखना पड़ा। उस फिल्म के बाद कई साल बहुत संघर्ष भरे थे। वे ये मानते हैं कि हम जीवन में सफलताओं से कहीं ज्यादा अपनी असफलताओं से सीखते हैं। लेकिन हमेशा और हर किसी के साथ ये नहीं होता कि वह असफलता को एक शिक्षक मानकर उससे जिंदगी के सबक सीखे। लोग अक्सर असफलता से डर जाते हैं। यह डर कई बार इतना गहरा होता है कि वे इससे उबर ही नहीं पाते। वे न तो असफलता से डील कर पाते हैं और न ही अपने लक्ष्य के लिए दोबारा कोशिश कर पाते हैं। तो आज ‘रिलेशनशिप’ कॉलम में बात करेंगे असफलताओं की। एक्सपर्ट से समझेंगे कि इसे कैसे स्वीकार करें, कैसे डील करें और असफलताओं के डर से कैसे आगे बढ़ें। वो कहते हैं न कि डर के आगे जीत है। असफलता का डर- ‘आटिकिफोबिया’ असफलता के डर के लिए मनोविज्ञान में एक शब्द है- ‘आटिकिफोबिया’ (Atychiphobia)। ये एक तरह का भय है। इस फोबिया से ग्रस्त लोगों को हमेशा यह डर लगा रहता है कि कहीं वो फेल न हो जाएं। असफल हो जाने के डर से कई बार वो किसी नए काम की शुरुआत ही नहीं करते। वो जीवन में कोई भी रिस्क लेने से डरते हैं और कारण यही होता है कि उन्हें असफल होने का डर सताता रहता है। मानसिक स्वास्थ्य और विकास पर असफलताओं का प्रभाव शोध से पता चलता है कि असफलता का अहसास मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव डाल सकता है। बार-बार मिल रही असफलता का किसी व्यक्ति के मानसिक और भावनात्मक वेलबीइंग पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ नोवल रिसर्च एंड डेवेलपमेंट (IJNRD) की एक स्टडी कहती है कि आटिकिफोबिया बच्चों में तब होता है, जब वे हार के दौरान चिंता और डर का अनुभव करते हैं। एडल्ट्स में असफलता का ये डर क्रॉनिक तनाव का रूप भी ले सकता है। इसका परिणाम कई नकारात्मक प्रभावों के तौर पर देखने को मिल सकता है। अमेरिका में 2015 में लोगों में असफलता के डर को लेकर एक सर्वे किया गया। इस सर्वे में शामिल 1,083 वयस्कों में 31% लोगों में असफलता का डर था। उनमें से लगभग 4.2% लोग भारतीय मूल के थे। अपनी असफलताओं से कैसे सीखें इस दुनिया में असफलता के बिना सफलता मिलना दुर्लभ है। जब आप अपने सपनों का पीछा करते हैं तो आपके असफल होने की संभावना भी उतनी ही हो सकती है, जितनी कि सफल होने की। अक्सर कहा जाता है कि असफलता लोगों को नहीं रोकती, बल्कि लोग असफलता से जिस तरह से डील करते हैं, वही उन्हें आगे बढ़ने से रोकता है। असफलता से कैसे उबरें असफलता निराश करती है। हालांकि इसका असर उम्र के हिसाब से ज्यादा-कम भी हो सकता है। 20 और 30 की उम्र में असफलताओं का सामना करना ज्यादा मुश्किल हो सकता है क्योंकि यह पहली बार है, जब हम बड़ी विफलताओं का अनुभव कर रहे होते हैं। विश्वविद्यालय में अच्छा प्रदर्शन न कर पाना, नौकरी छूट जाना, कॉम्पिटिशन में फेल हो जाना या फिर कोई कॉम्पिटिटिव एग्जाम कई बार देने के बाद भी क्लियर नहीं कर पाना। यह सभी असफलताएं इंसान को निराश कर देती हैं। बहुत कम लोग ही होते हैं, जो फिर एक बार प्रयास करने की सोचते हैं या इसे कर भी पाते हैं। इसलिए सबसे जरूरी है असफलता को स्वीकार करने के साथ उससे ऊपर उठने और उसे जीतने का प्रयास करना। नीचे ग्राफिक में देखिए कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए हमें असफलताओं से कैसे डील करना चाहिए।