पिता की बीमारी के चलते बेटी बनी ‘ड्राइवर छोरी’:पड़ोसियों के ताने सहे, चाहत को पेशा बनाया; हरियाणा रोडवेज में ड्राइवर बनने का सपना

हरियाणा में जींद की रहने वाली 21 साल की निशु देसवाल मौजूदा समय में लड़कियों के लिए प्रेरणा हैं। वह हरियाणा में ड्राइवर छोरी के नाम से मशहूर हैं। उन्होंने ड्राइवरी में साबित किया है कि लड़कियां भी चाहें तो ड्राइवरी को पेशे के रूप में चुन सकती हैं। बीए तक की पढ़ी निशु का सपना हरियाणा रोडवेज में ड्राइवर बनना है, इसलिए उन्होंने अपने घर में ही ड्राइवरी का मौका खोज लिया। उन्होंने अपने पिता के बीमार होते ही उनकी लोडिंग गाड़ी चलाना शुरू कर दी। यह उनकी जरूरत भी थी, और चाहत भी। इससे वह लड़कों जैसा काम कर इलाके में मशहूर हो गईं। भले ही उनके पड़ोसी इस काम के लिए उन्हें ताने मारते रहे, लेकिन वह ड्राइवरी के साथ घर के काम भी देखती रहीं, जिससे घरवालों को उनके काम से कभी कोई ऐतराज नहीं हुआ। मौजूदा समय में निशु लोडिंग गाड़ी चलाती हैं और सोशल मीडिया पर भी काफी एक्टिव हैं। सिलसिलेवार ढंग से पढ़िए, निशु के ड्राइवर छोरी बनने की कहानी… निशु के पिता चलते थे लोडिंग टेंपो
निशु देसवाल का जन्म जींद जिले के सफीदों क्षेत्र के गांव हाडवा में हुआ। उनके पिता का नाम मुकेश कुमार है, जो पेशे से ड्राइवर थे। वह लोडिंग गाड़ी चलाते थे। वहीं, निशु का मां सुमनलता गृहिणी हैं। निशु का एक भाई मनदीप भी है, जो गुरुग्राम की एक कंपनी में नौकरी करता है। निशु के पिता ड्राइवरी कर परिवार को पालते थे। साथ में खेतीबाड़ी भी उनका पेशा था। लेकिन, 2019 में उनकी तबीयत खराब हो गई। तब निशु 16 साल की थीं। उनके पिता की पैरों की नसें ब्लॉक हो गई थी। साथ ही रीढ़ की हड्‌डी में भी दिक्कत थी। इसकी वजह से वह ज्यादा समय तक बैठ नहीं पाते, चल नहीं पाते थे। पिता ने 2022 में बीमारी के कारण छोड़ दी ड्राइवरी
जब मुकेश कुमार का इलाज करवाया तो 4 ऑपरेशन के बाद वह चलने फिर तो लगे, लेकिन कोई भी काम कुछेक घंटे तक नहीं कर सकते थे। इसलिए, 2022 में उन्होंने अपनी ड्राइवरी छोड़ दी। साथ ही इलाज पर काफी पैसा खर्च हुआ, जिससे उनके घर की आर्थिक स्थिति गड़बड़ा गई। इसी दौरान निशु के भाई मनदीप ने नौकरी शुरू की, जिससे घर चल सके। साथ ही निशु को भी अपने सपनों को पंख लगाने का यही मौका सही लगा। इसके बाद निशु ने अपने पिता का लोडिंग टेंपो चलाना शुरू कर दिया। छठी क्लास से काम करने लगी थी निशु
निशु की मां सुमनलता बताती हैं कि निशु छठी क्लास से ही घर के कामकाज में रुचि लेने लगी थी। वह मेहनती थी, निडर थी और काम के प्रति ईमानदार भी थी। उसे घर के काम अलावा खेतों में काम करना, भैंसों के लिए चारा लाना, काटना और डालना, भैंसों का दूध दुहना, आदि काम बखूबी आते हैं। इसके अलावा उसका मन गाड़ी चलाने में भी बहुत लगता है। वह जब छोटी थी, तो अक्सर अपने पिता की गाड़ी चलाने की जिद करती थी। हालांकि, तब उसे गाड़ी दी नहीं जाती थी। वह स्कूटी, मोटरसाइकिल और साइकिल पर ही हर समय चढ़ी रहती थी। जब थोड़ी बड़ी हुई तो उसने पापा के साथ लोडिंग गाड़ी भी चलाना सीख ली। शुरुआत आसपास से की, अब दूसरे राज्यों की भी बुकिंग मिलती हैं
सुमनलता बताती हैं कि जब पति की तबीयत पूरी तरह बिगड़ी तो उन्हें चिंता हुई थी कि उनकी गाड़ी को अब कौन संभालेगा। क्योंकि, मनदीप ड्राइवर बनने में रुचि नहीं ले रहा था। लेकिन, जब 2024 से निशु ने उनकी गाड़ी की स्टीयरिंग थाम तो उनकी यह चिंता भी दूर हो गई। शुरुआत में निशु गाड़ी से केवल आसपास के काम ही निपटाती थी। उसने लोग पशुओं को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने, पराली ढोने जैसे काम देते थे। बाद में पूरे हरियाणा के अलावा अन्य राज्यों के लिए भी निशु को बुकिंग मिलनी शुरू हो गईं। आज स्थिति यह है कि गांव में जो लोग निशु को मर्दों जैसे काम करते देखकर ताने मारते थे, आज वही लोग निशु पर गर्व महसूस करते हैं। निशु को भी लगता है कि वह इस ड्राइवरी के दम पर ही एक दिन हरियाणा रोडवेज में ड्राइवर भी बन ही जाएगी।