गुरु पूजा का महापर्व आज:श्रीकृष्ण और बलराम के गुरु थे सांदीपनि, सूर्यदेव ने हनुमान को दिया था ज्ञान, जानिए शास्त्रों के 9 गुरु और उनकी खास बातें

रविवार, 21 जुलाई को गुरु पूजा का महापर्व है। हर साल आषाढ़ मास की पूर्णिमा पर गुरु पूर्णिमा मनाई जाती है। इस दिन हमें अपने गुरु की विशेष पूजा करनी चाहिए। गुरु के बिना ज्ञान नहीं मिलता है। इसलिए श्रीराम, श्रीकृष्ण, हनुमान जैसे देवताओं ने भी गुरु बनाए थे। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य और भागवत कथाकार पं. मनीष शर्मा से जानिए शास्त्रों के 9 गुरु और उनसे जुड़ी खास बातें… वशिष्ठ मुनि वशिष्ठ जी को ब्रहमऋषि कहा जाता है। वे श्रीराम के रघुकुल के राजगुरु थे। उन्होंने राजा दशरथ को भी ज्ञान दिया था। बाद में वशिष्ठ मुनि ने श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्र को भी शिक्षा दी थी। ऋषि विश्वामित्र और वशिष्ठ मुनि से जुड़ी एक कथा है। ऋषि बनने से पहले विश्वामित्र एक राजा थे। उन्होंने राज-पाठ छोड़कर तपस्या शुरू कर दी, क्योंकि वे ब्रह्म ऋषि बनना चाहते थे। उन्होंने कठोर तप किया, लेकिन उन्हें वे ब्रह्म ऋषि नहीं बन पा रहे थे।
एक दिन विश्वामित्र से अन्य ऋषियों ने कहा कि जब तक वशिष्ठ मुनि आपको ब्रह्मर्षि नहीं कहेंगे, तब तक आप राजसी के रूप में ही पहचाने जाएंगे। वशिष्ठ जी और विश्वामित्र जी के बीच विवाद था, लेकिन विश्वामित्र के तप की वजह से वशिष्ठ जी ने उन्हें ब्रह्म ऋषि का पद दे दिया था। महर्षि वेद व्यास गुरु पूर्णिमा महर्षि वेद व्यास की जन्म तिथि पर ही मनाई जाती है। वे पाराशर ऋषि और सत्यवती के पुत्र थे। उनका प्रारंभिक नाम कृष्णद्वैपायन था। इन्होंने वेदों का संपादन किया था, इस कारण इन्हें वेद व्यास कहा जाता है। वेद व्यास जी ने महाभारत, श्रीमद् भागवत कथा के साथ ही सभी पुराणों की रचना की थी। कई ऋषिमुनि इनके शिष्य थे। शुकदेव वेद व्यास के पुत्र थे, इन्होंने राजा परीक्षित को पहली बार भागवत कथा सुनाई थी। देव गुरु बृहस्पति बृहस्पति सभी देवताओं के गुरु हैं। देवताओं के सभी काम इनकी सहमति से ही होते हैं। देवगुरु बृहस्पति को नौ ग्रहों में से एक माना जाता है। कई बार बृहस्पति ने अपनी सलाह से देवताओं को दानवों से बचाया था। जब दैत्य राज बलि भगवान विष्णु को अपने साथ पाताल लोक ले गया था, तब बृहस्पति ने ही लक्ष्मी जी को सलाह दी थी कि वे बलि के अपना भाई बना लें और उसकी कलाई पर रक्षासूत्र बांधें। लक्ष्मी जी ने गुरु की बात मानकर ऐसा ही किया, इसके बाद अपनी बहन लक्ष्मी की इच्छा पूरी करने के लिए उसने विष्णु जी को अपने धाम भेज दिया। शुक्रचार्य असुरों के गुरु का नाम है शुक्राचार्य। शुक्राचार्य ने दानवों की रक्षा के लिए महादेव को प्रसन्न कर मृतसंजीवनी विद्या हासिल की थी। इस विद्या के प्रभाव से शुक्राचार्य मृत असुरों को जीवित कर देते थे। शुक्राचार्य ने नीति शास्त्र की रचना की थी, जिसमें जीवन में सुख-शांति और सफलता पाने की नीतियां बताई गई हैं। परशुराम
भगवान विष्णु के अवतार परशुराम चिरंजीवी माने गए हैं। इनके पिता जमदग्नि और माता रेणुका थीं। इनका प्रारंभिक नाम राम था, जब इन्हें शिव जी से परशु नाम का एक अस्त्र मिला, तब इनका नाम परशुराम पड़ा। इनका जिक्र रामायण में और महाभारत में आता है। रामायण के समय त्रेतायुग था और महाभारत के समय द्वापर। परशुराम ने कई बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन कर दिया था। परशुराम और श्रीराम की भेंट के बार में रामायण में लिखा है। महाभारत के समय में परशुराम ने द्रोणाचार्य, भीष्म पितामह और कर्ण को शस्त्र विद्या का ज्ञान दिया था। परशुराम जी सभी शस्त्रों और शास्त्रों के ज्ञाता थे। सूर्य सूर्य देव हनुमान जी ने के गुरु हैं। जब हनुमान जी सूर्य देव से गुरु बनने की बात की तो सूर्य देव कहा था कि वे एक पल भी रुक नहीं सकते, इसलिए शिक्षा नहीं दे पाएंगे। तब हनुमान जी ने कहा था कि वे सूर्य देव के साथ चलते-चलते ज्ञान हासिल कर लेंगे। इस बात के लिए सूर्य तैयार हो गए और उन्होंने हनुमान जी को सभी वेदों का ज्ञान दिया। महाभारत काल में कर्ण सूर्य के पुत्र ही थे। ​​​​​​​ ऋषि सांदीपनि द्वापर युग में श्रीकृष्ण और बलराम ने उज्जैन के ऋषि सांदीपनि से शिक्षा हासिल की थी। भगवान सांदीपनि के आश्रम में 64 दिन रुके थे और उन्होंने 64 कलाएं सीखी थीं। आश्रम में श्रीकृष्ण की मित्रता सुदामा से हुई थी। द्रोणाचार्य द्वापर युग में ऋषि भारद्वाज थे, उनके पुत्र का नाम द्रोणाचार्य था। वे पांडवों और कौरवों के गुरु थे। द्रोणाचार्य का विवाह कृपाचार्य की बहन कृपी से हुआ था, इनके पुत्र का नाम अश्वत्थामा है। द्रोणाचार्य का वध महाभारत युद्ध में धृष्टद्युम्न ने किया था। नारद जी ​​​​​​​देवर्षि नारद को भक्त प्रहलाद, ध्रुव का गुरु माना जाता है। नारद के मार्गदर्शन की वजह से प्रहलाद और ध्रुव को भगवान की कृपा मिली। देवी पार्वती शिव जी को वर के रूप में प्राप्त करना चाहती थीं, उस समय नारद मुनि ने ही देवी को तप करने की सलाह दी थी। नारद मुनि की सलाह से ही देवी पार्वती को शिव जी पति रूप में प्राप्त हुए।